कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 348, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है। उसके पश्चात् इन व्याहृतियोंमें लोकोंका चिन्तन करनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—'भूः' यह तो मानो पृथ्वीलोक है, 'भुवः' यह अन्तरिक्षलोक है, 'स्वः' यह सुप्रसिद्ध स्वर्गलोक है और 'महः' यह सूर्य है, क्योंकि सूर्यसे ही सब लोक महिमान्वित हो रहे हैं। तात्पर्य यह कि भूः, भुवः, स्वः—ये तीनों व्याहृतियाँ तो उन परमेश्वरके विराट् शरीररूप इस स्थूल ब्रह्माण्डको बतानेवाली—अर्थात् परमेश्वरके अङ्गोंके नाम हैं तथा 'महः' यह चौथी व्याहृति इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले उसके आत्मारूप स्वय परमेश्वरको बतानेवाली है। 'महः' यह सूर्यका नाम है, सूर्यके भी आत्मा हैं परमेश्वर, अतः सूर्यरूपसे सब लोकोंको वे ही प्रकाशित करते हैं। इसलिये यहाँ सूर्यके उपलक्षणसे इस विराट् शरीरको आत्मारूपसे प्रकाशित करनेवाले परमेश्वरकी ही उपासनाका लक्ष्य कराया गया है।
भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूंꣳषि। मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते।
भूः=भूः; इति=यह व्याहृति; वै=ही; अग्निः=अग्नि है; [भुवः='भुवः', इति=यह; वायुः=वायु है; सुवः='स्वः', इति=यह; आदित्यः=आदित्य है; महः='महः'; इति=यह; चन्द्रमाः=चन्द्रमा है; (क्योंकि) चन्द्रमसा=चन्द्रमासे; वाव=ही; सर्वाणि=समस्त; ज्योतींषि=ज्योतियाँ; महीयन्ते=महिमावाली होती हैं; भूः='भूः'; इति=यह व्याहृति; वै=ही; ऋचः=ऋग्वेद है; भुवः='भुवः', इति=यह; सामानि=सामवेद है; सुवः='स्वः', इति= यह; यजूंषि=यजुर्वेद है; महः='महः', इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; (क्योंकि) ब्रह्मणा=ब्रह्मसे; वाव=ही; सर्वे=समस्त; वेदाः=वेद; महीयन्ते=महिमावान् होते हैं।
**व्याख्या—**इसी प्रकार फिर ज्योतियोंमें इन व्याहृतियोंद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि 'भूः' यह व्याहृति अग्निका नाम होनेसे मानो अग्नि ही है। अग्निदेवता वाणीका अधिष्ठाता है और वाणी भी प्रत्येक विषयको व्यक्त करके स्वयं प्रकाशित होनेसे ज्योति है; अतः वह भी ज्योतियोंकी उपासनामें मानो 'भूः' है। 'भुवः' यह वायु है। वायुदेवता त्वक् इन्द्रियका अधिष्ठाता है और त्वक्-इन्द्रिय स्पर्शको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामे वायु और त्वचाको 'भुवः'रूप समझना चाहिये। 'स्वः' यह सूर्य है। सूर्य चक्षु-इन्द्रियका अधिष्ठातृ-देवता है; चक्षु-इन्द्रिय भी सूर्यकी सहायतासे रूपको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योति विषयक उपासनामें सूर्य और चक्षु- इन्द्रियको 'स्वः' व्याहृतिस्वरूप समझना चाहिये। 'महः' यह चौथी व्याहृति ही मानो चन्द्रमा है; चन्द्रमा मनका अधिष्ठातृ- देवता है। मनकी सहायतासे, मनके साथ रहनेपर ही समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रकाशित कर सकती हैं; मनके बिना नहीं कर सकतीं; अतः सब ज्योतियोंमें प्रधान चन्द्रमा और मनको ही 'महः' व्याहृतिरूप समझना चाहिये; क्योंकि चन्द्रमासे अर्थात् मनसे ही समस्त ज्योतिरूप इन्द्रियाँ महिमान्वित होती है। इस प्रकार मनके रूपमे परमेश्वरकी उपासना करनेकी विधि समझायी गयी। फिर इसी भाँति वेदोंके विषयमें व्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि 'भूः' यह ऋग्वेद है; 'भुवः' यह सामवेद है; 'स्वः' यह यजुर्वेद है और 'महः' यह ब्रह्म है; क्योंकि ब्रह्मसे ही समस्त वेद महिमायुक्त होते हैं। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण वेदोंमें वर्णित समस्त ज्ञान परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्रकट और उन्हींसे व्याप्त है तथा उन परमेश्वरके तत्त्वका इन वेदोंमें वर्णन है; इसीलिये इनकी महिमा है। इस प्रकार वेदोंमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासना करनी चाहिये।
भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति।