कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 832 में से
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- तैत्तिरीयोपनिषद् * | ३२३
भू:= 'भूः', इति = यह व्याहृति; वै = ही; प्राणः = प्राण है, भुवः = 'भुवः', इति = यह, अपानः = अपान- है; सुवः = 'स्वः', इति = यह; व्यानः = व्यान है, महः = 'महः', इति = यह, अन्नम् = अन्न है, (क्योंकि) अन्नेन = अन्नसे, वाव = ही; सर्वे = समस्त, प्राणाः = प्राण, महीयन्ते = महिमायुक्त होते हैं; ताः = वे, वै = ही; एताः = ये, चतस्रः = चारों व्याहृतियाँ, चतुर्धा = चार प्रकारकी हैं, (अतएव) चतस्रः चतस्रः = एक-एकके चार-चार भेद होनेसे कुल सोलह; व्याहृतयः = व्याहृतियाँ हैं; ताः = उनको; यः = जो; वेद = तत्त्वसे जानता है, सः = वह; ब्रह्म = ब्रह्मको, वेद = जानना है; अस्मै = इस ब्रह्मवेत्ताके लिये, सर्वे = समस्त, देवाः = देवता, बलिम् = भेंट; आवहन्ति = समर्पण करते हैं ।
व्याख्या—उसके बाद प्राणोंके विषयमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासनाका प्रकार समझाया गया है । भाव यह है कि 'भूः' यही मानो प्राण है, 'भुवः' यह अपान है, 'स्वः' यह व्यान है । इस प्रकार जगद्व्यापी समस्त प्राण-ही मानो ये तीनों व्याहृतियाँ है और अन्न 'महः' रूप चतुर्थ व्याहृति है, क्योंकि जिस प्रकार व्याहृतियोंमें 'महः' प्रधान है, उसी प्रकार समस्त प्राणोंका पोषण करके उनकी महिमाको बनाये रखने और बढ़ानेके कारण उनकी अपेक्षा अन्न प्रधान' है, अतः प्राणोंके अन्तर्यामी परमेश्वरकी अन्नके रूपमें उपासना करनी चाहिये ।
इस तरह चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयुक्त करके उपासना करनेकी रीति बताकर फिर उसे समझकर उपासना करनेका फल बताया गया है । भाव यह कि चार प्रकारसे प्रयुक्त इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाके भेदको जो कोई जान लेता है, अर्थात् समझकर उसके अनुसार परब्रह्म परमात्माकी उपासना करता है, वह ब्रह्मको जान लेता है और समस्त देव उसको भेंट समर्पण करते हैं—उसे परमेश्वरका प्यारा समझकर उसका आदर-सत्कार करते हैं ।
॥ पञ्चम अनुवाक ॥ ५ ॥
अनुवाक
स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः ।
सः = वह (पहले बताया हुआ); यः = जो, एषः = यह; अन्तर्हृदये = हृदयके भीतर, आकाशः = आकाश है; तस्मिन् = उसमें; अयम् = यह, हिरण्मयः = विशुद्ध प्रकाशस्वरूप; अमृतः = अविनाशी, मनोमयः = मनोमय, पुरुषः = पुरुष- (परमेश्वर) रहता है ।
व्याख्या—इस अनुवाकमें चार बातें कही गयी हैं, उनका पूर्व अनुवाकमें बतलाये हुए उपदेशसे अलग-अलग संबन्ध है और उस उपदेशकी पूर्तिके लिये ही यह आरम्भ किया गया है, ऐसा अनुमान होता है ।
पूर्व अनुवाकमें मनके अधिष्ठातृ-देवता चन्द्रमाको इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंका प्रकाशक बताया गया है और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेकी युक्ति समझायी गयी है; वे मनोमय परब्रह्म—सबके अन्तर्यामी पुरुष कहाँ है, उनकी उपलब्धि कहाँ होती है—यह बात इस अनुवाकके पहले अंशमें समझायी गयी है । अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि पहले बतलाया हुआ जो यह हृदयके भीतर अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला आकाश है, उसीमें ये विशुद्ध प्रकाशस्वरूप अविनाशी मनोमय अन्तर्यामी परम पुरुष परमेश्वर विराजमान हैं, वहीं उनका साक्षात्कार हो जाता है, उन्हें पानेके लिये कहीं दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता ।
अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ । सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि ।
- अन्तरेण तालुके = दोनों तालुओंके बीचमें, यः = जो, एषः = यह, स्तनः इव = स्तनके सदृश, अवलम्बते = लटक रहा है* [ तम् अपि अन्तरेण = उसके भी भीतर, ] यत्र = जहाँ, असौ = वह; केशान्तः = केशोंका मूलस्थान (ब्रह्मरन्ध्र); विवर्तते =