भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 351
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३२५ सूक्ष्म शरीरवाले हैं। एकमात्र सत्तारूप हैं। समस्त इन्द्रियोंको विश्राम देनेवाले और मनके लिये परम आनन्ददायक हैं। अखण्ड शान्तिके भण्डार हैं और सर्वथा अविनाशी हैं। परम विश्वासके साथ यों मानकर साधकको उनकी प्राप्तिके लिये उनके चिन्तन और ध्यानमें तत्परताके साथ लग जाना चाहिये, यह भाव दिखलानेके लिये अन्तमें श्रुतिकी वाणीमें ऋषि अपने शिष्यसे कहते हैं—'हे प्राचीनयोग्य !* तू उन ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकारका मानकर उनकी उपासना कर ।' ॥ षष्ठ अनुवाक ॥ ६ ॥
अनुवाक
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः । अग्निवायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो
वनस्पतय आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः : । चक्षुः
श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसँस्नावास्थि । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा
इदं सर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तँस्पृणोतीति ।
पृथिवी=पृथ्वीलोक; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षलोक; द्यौः = स्वर्गलोक; दिशः=दिशाएँ; अवान्तरदिशः=अवान्तर
दिशाएँ—दिशाओंके बीचके कोण (यह पाँच लोकोंकी पङ्क्ति है); अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु; आदित्यः=सूर्य; चन्द्रमाः=
चन्द्रमा; नक्षत्राणि = ( तथा ) समस्त नक्षत्र (यह पाँच ज्योतिःसमुदायकी पङ्क्ति है), आपः = जल, ओषधयः=ओषधियाँ;
:=वनस्पतियाँ, =आकाश; आत्मा=( तथा ) इनका संघातस्वरूप अन्नमय स्थूलशरीर (ये पाँचों
मिलकर स्थूल पदार्थोंकी पङ्क्ति है ), इति = यह; अधिभूतम् = आधिभौतिक दृष्टिसे वर्णन हुआ; अथ=अब; अध्यात्मम्=
आध्यात्मिक दृष्टिसे बतलाते हैं, प्राणः=प्राण, व्यानः=व्यान; अपानः=अपान; उदानः =उदान; (और) समानः =समान
( यह पाँचों प्राणोंकी पङ्क्ति है ); चक्षुः =नेत्र; श्रोत्रम् =कान; मनः=मन; वाक्=वाणी; (और) त्वक्=त्वचा ( यह
पाँचों करणोंकी पङ्क्ति है ); चर्म =चर्म, मांसम् = मास, स्नावा=नाड़ी, अस्थि=हड्डी; (और) मज्जा=मज्जा (यह
पाँच शरीरगत धातुओंकी पङ्क्ति है ), एतत् =यह ( इस प्रकार ); अधिविधाय =सम्यक कल्पना करके; ऋषिः=ऋषिने;
अवोचत्=कहा; इदम्=यह, सर्वम्=सव; वै=निश्चय ही; पाङ्क्तम्=पाङ्क्त है,† पाङ्क्तेन एव पाङ्क्तम्=
( साधक ) इस आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही बाह्य पाङ्क्तको और बाह्यसे अध्यात्म पाङ्क्तको; स्पृणोति इति=पूर्ण करता है।
—इस अनुवाकके दो भाग हैं। पहले भागमें मुख्य-मुख्य आधिभौतिक पदार्थोंको लोक, ज्योति और स्थूल-
पदार्थ—इन तीन पङ्क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है और दूसरे भागमें मुख्य-मुख्य आध्यात्मिक ( शरीरस्थित )
पदार्थोंको प्राण, करण और धातु—इन तीन पङ्क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है। अन्तमें उनका उपयोग करने-
की युक्ति बतायी गयी है।
भाव यह है कि पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम आदि दिशाएँ और आग्नेय-नैर्ऋत्य आदि अवान्तर
दिशाएँ—इस प्रकार यह लोकोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इस प्रकार यह
ज्योतियोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। तथा जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर—इस प्रकार
यह स्थूल जड़-पदार्थोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। यह सब मिलकर आधिभौतिक पाङ्क्त अर्थात् भौतिक पङ्क्तियोंका समूह है।
इसी प्रकार यह आगे बताया हुआ आध्यात्मिक—शरीरके भीतर रहनेवाला पाङ्क्त है। इसमें प्राण, व्यान, अपान, उदान और
समान—इस प्रकार यह प्राणोंकी पङ्क्ति है। नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा—इस प्रकार यह करण-समुदायकी पङ्क्ति है।
तथा चर्म, मास, नाड़ी, हड्डी और मज्जा—इस प्रकार यह शरीरगत धातुओंकी पङ्क्ति है। इस प्रकार प्रधान-प्रधान आधिभौतिक
और आध्यात्मिक पदार्थोंकी त्रिविध पङ्क्तियाँ बनाकर वर्णन करना यहाँ उपलक्षणरूपमें है, अतः शेष पदार्थोंको भी इनके
* पहलेसे ही जिसमें ब्रह्म-प्राप्तिकी योग्यता हो, वह 'प्राचीनयोग्य' है। अथवा यह शिष्यका नाम है।
† पङ्क्तिका समूह ही 'पाङ्क्त' है।