भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 832 में से

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पृष्ठ 352

३२६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। इस प्रकार वर्णन करनेके बाद श्रुति कहती है कि ये पङ्क्तियोंमें विभक्त करके बताये हुए पदार्थ सब-के-सब पङ्क्तियोंके समुदाय हैं। इनका आपसमें घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस रहस्यको समझकर अर्थात् किस आधिभौतिक पदार्थके साथ किस आध्यात्मिक पदार्थका क्या सम्बन्ध है, इस बातको भलीभाँति समझकर मनुष्य आध्यात्मिक शक्तिसे भौतिक पदार्थोंका विकास कर लेता है और भौतिक पदार्थोंसे आध्यात्मिक शक्तियोंकी उन्नति कर लेता है। पहली आधिभौतिक लोकसम्बन्धी पङ्क्तिसे चौथी प्राण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है, क्योंकि एक लोकसे दूसरे लोकको सम्बद्ध करनेमें प्राणोंकी ही प्रधानता है—यह बात सहिता-प्रकरणमें पहले बता आये हैं। दूसरी ज्योति- विषयक आधिभौतिक पङ्क्तिसे पाँचवीं करण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है; क्योंकि वे आधिभौतिक ज्योतियाँ इन आध्यात्मिक ज्योतियोंकी सहायक हैं, यह बात शास्त्रोंमें जगह-जगह बतायी गयी है। इसी प्रकार तीसरी जो स्थूल पदार्थों- की आधिभौतिक पङ्क्ति है, उसका छठी शरीरगत धातुओं की आध्यात्मिक पङ्क्तिसे सम्बन्ध है; क्योंकि ओषधि और वनस्पति- रूप अन्नसे ही मास मज्जा आदिकी पुष्टि और वृद्धि होती है, यह प्रत्यक्ष है। इस प्रकार प्रत्येक स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका उपयोग करनेसे मनुष्य सब प्रकारकी सासारिक उन्नति कर सकता है, यही इस वर्णनका भाव मालूम होता है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अनुवाक ओमिति ब्रह्म । ओमितीद ूँ सर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओ३शोमिति शस्त्राणि श ूँ सन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपामवानीति । ब्रह्मैवोपामोति । ओम् = 'ओम्', इति = यह, ब्रह्म = ब्रह्म है, ओम् = 'ओम्', इति = ही, इदम् = यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला; सर्वम् = समस्त जगत् है, ओम् = 'ओम्', इति = इस प्रकारका, एतत् = यह अक्षर, ह = ही, वै = निःसदेह, अनुकृतिः = अनुकृति (अनुमोदन) है, स्म = यह बात प्रसिद्ध है; अपि = इसके सिवा, ओ = हे आचार्य; श्रावय = मुझे सुनाइये; इति = यों कहनेपर, आश्रावयन्ति = ('ओम्' यों कहकर शिष्यको) उपदेश सुनाते हैं, ओम् = 'ओम्' (बहुत अच्छा), इति = इस प्रकार (स्वीकृति देकर), [ सामगाः = सामगायक विद्वान्, ] सामानि = सामवेद, गायन्ति = गाते हैं, ओम् शोम् = 'ओम् शोम्', इति = यों कहकर ही, शस्त्राणि = शस्त्रोंको अर्थात् मन्त्रोंको, शंसन्ति = पढते हैं; ओम् = 'ओम्', इति = यों कहकर; अध्वर्युः = अध्वर्यु नामक ऋत्विक, प्रतिगरम् प्रतिगृणाति = प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है 'ओम्'= 'ओम्', इति = यों कहकर, ब्रह्मा = ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्); प्रसौति = अनुमति देता है; ओम् = 'ओम्', इति = यह कहकर, अग्निहोत्रम् अनुजानाति = अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है, प्रवक्ष्यन् = अध्ययन करनेके लिये उद्यत; ब्राह्मणः = ब्राह्मण, ओम् इति = पहले ओम् का उच्चारण करके, आह = कहता है, ब्रह्म = (मैं) वेदको, उपाप्नवानि इति = प्राप्त करूँ, ब्रह्म = (फिर वह) वेदको, एव = निश्चय ही, उपाप्नोति = प्राप्त करता है। व्याख्या—इस अनुवाकमें 'ॐ' इस परमेश्वरके नामके प्रति मनुष्यकी श्रद्धा और रुचि उत्पन्न करनेके लिये ॐकारकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि 'ॐ' यह परब्रह्म परमात्माका नाम होनेसे साक्षात् ब्रह्म ही है, क्योंकि भगवान्का नाम भी भगवत्स्वरूप ही होता है। यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला समस्त जगत् 'ॐ' है अर्थात् उस ब्रह्मका ही स्थूलरूप है। 'ॐ' यह अनुकृति अर्थात् अनुमोदनका सूचक है। अर्थात् जब किसीकी बातका अनुमोदन करना होता है, तब श्रेष्ठ पुरुष परमेश्वरके नामस्वरूप इस ॐ कारका उच्चारण करके संकेतसे उसका अनुमोदन कर दिया करते हैं, दूसरे व्यर्थ शब्द नहीं बोलते—यह बात प्रसिद्ध है। जब शिष्य अपने गुरुसे तथा श्रोता किसी व्याख्यानदातासे उपदेश सुनानेके लिये प्रार्थना