कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरता है, तब गुरु और वक्ता भी 'ॐ' इस प्रकार कहकर ही उपदेश सुनाना आरम्भ करते हैं। सामवेदका गान करनेवाले भी 'ॐ' इस प्रकार पहले परमेश्वरके नामका भलीभाँति गान करके उसके बाद सामवेदका गान किया करते हैं। यज्ञकर्ममें शस्त्र-शंसनरूप कर्म करनेवाले शास्ता नामक ऋत्विक् 'ओम् शोम्' इस प्रकार कहकर ही शस्त्रोंका अर्थात् तद्विषयक मन्त्रोंका पाठ करते हैं। यज्ञकर्म करानेवाला अध्वर्यु नामक ऋत्विक् भी 'ॐ' इस परमेश्वरके नामका उच्चारण करके ही प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है। ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्) भी 'ॐ' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके यज्ञ- कर्म करनेके लिये अनुमति देता है, तथा 'ॐ' यों कहकर ही अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है। अध्ययन करनेके लिये उद्यत ब्राह्मण ब्रह्मचारी भी 'ॐ' इस प्रकार परमेश्वरके नामका पहले उच्चारण करके कहता है कि 'मैं वेदको भली प्रकार पढ सकूँ।' अर्थात् ॐकार जिसका नाम है, उस परमेश्वरसे ॐकारके उच्चारणपूर्वक यह प्रार्थना करता है कि 'मैं वेदको—वैदिक ज्ञानको प्राप्त कर लूँ—ऐसी बुद्धि दीजिये।' इसके फलस्वरूप वह वेदको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार इस मन्त्रमें ॐकारकी महिमाका वर्णन है। ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥
नवम अनुवाक ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः । ऋतम्=यथायोग्य सदाचारका पालन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढना-पढाना भी (यह सब अवश्य करना चाहिये), सत्यम्=सत्यभाषण, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), तपः=तपश्चर्या, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); दमः=इन्द्रियोंका दमन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), शमः= मनका निग्रह, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अग्नयः=अग्नियोंका -चयन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अतिथयः=अतिथियोंकी सेवा, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), मानुषम्=मनुष्योचित लौकिक -व्यवहार, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), प्रजा=गर्भाधान- -संस्काररूप कर्म, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), प्रजनः=शास्त्रविधिके अनुसार स्त्रीसहवास, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), प्रजातिः=कुटुम्ब- -वृद्धिका कर्म, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), सत्यम्=सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है, इति=यो, राथीतरः=रथीतरका पुत्र, सत्यवचाः=सत्यवचा ऋषि कहते हैं; तपः=तप ही सर्वश्रेष्ठ है, इति= -यों, पौरुशिष्टिः=पुरुशिष्टका पुत्र, तपोनित्यः=तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं; स्वाध्यायप्रवचने एव=वेदका पढना- -पढाना ही सर्वश्रेष्ठ है, इति=यों, मौद्गल्यः=मुद्गलके पुत्र, नाकः='नाक' मुनि कहते हैं; हि=क्योंकि, तत्=वही, तपः= तप है, तत् हि=वही, तपः=तप है। व्याख्या—इस अनुवाकमें यह बात समझायी गयी है कि अध्ययन और अध्यापन करनेवालोंको अध्ययन-अध्यापन-