कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ ~ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति › के साथ-साथ शास्त्रोंमें बताये हुए मार्गपर स्वय चलना भी चाहिये । यही बात उपदेशक और उपदेश सुननेवालोंके विषयमें भी समझनी चाहिये । अभिप्राय यह है कि अध्ययन और अध्यापन दोनों बहुत ही उपयोगी हैं, शास्त्रोंके अध्ययनसे ही मनुष्य- को अपने कर्त्तव्यका तथा उसकी विधि और फलका ज्ञान होता है, अतः इसे करते हुए ही उसके साथ-साथ यथायोग्य सदा- चारका पालन, सत्यभाषण, स्वधर्मपालनके लिये बड़े-से-बड़ा कष्ट सहना, इन्द्रियोंको वशमे रखना, मनको वशमे रखना, अग्नि- होत्रके लिये अग्निको प्रदीप्त करना, फिर उसमे हवन करना, अतिथिकी यथायोग्य सेवा करना, सबके साथ सुन्दर मनुष्योचित लौकिक व्यवहार करना, शास्त्रविधिके अनुसार गर्भाधान करना और ऋतुकालमे नियमितरूपसे स्त्री-सहवास करना तथा कुटुम्बको बढ़ानेका उपाय करना—इस प्रकार इन सभी श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये । अध्यापक तथा उपदेशकके लिये तो इन सब कर्त्तव्योंका समुचित पालन और भी आवश्यक है, क्योकि उनका आदर्श उनके छात्र तथा श्रोता ग्रहण करते हैं। रथीतरके पुत्र सत्यवचा नामक ऋषिका कहना है कि 'इन सब कमोंमें सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि प्रत्येक कर्म सत्यभाषण और सत्यभावपूर्वक किये जानेपर ही यथार्थरूपसे सम्पन्न होता है।' पुरुशिष्टपुत्र तरोनित्य नामक ऋषिका कहना है कि 'तपश्चर्या ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि तपसे ही सत्यभाषण आदि समस्त धर्मोके पालन करनेकी और उनमे दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेकी शक्ति आती है।' मुङ्गलके पुत्र नाक नामक मुनिका कहना है कि 'वेद और धर्मशास्त्रोंका पठन-पाठन ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वही तप है, वही तप है । अर्थात् इन्हींसे तप आदि समस्त धर्मोका ज्ञान होता है।' इन सभी ऋषियोंका कहना यथार्थ है । उनके कथनको उद्धृत करके यह भाव दिखाया गया है कि प्रत्येक कर्ममे इन तीनोंकी प्रधानता रहनी चाहिये। जो कुछ कर्म किया जाय, वह पठन-पाठनसे उपलब्ध शास्त्रज्ञानके अनुकूल होना चाहिये । कितने ही विघ्न क्यों न उपस्थित हों, अपने कर्तव्यपालनरूप तपमे सदा दृढ रहना चाहिये और प्रत्येक क्रियामें सत्यभाव और सत्यभाषणपर विशेष ध्यान देना चाहिये। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥ दशम अनुवाक अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणम् स- वर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् । अहम् = मैं; वृक्षस्य = संसारवृक्षका; रेरिवा = उच्छेद करनेवाला हूँ, [ मम ] कीर्तिः = मेरी कीर्ति, गिरेः = पर्वतके; पृष्ठम् इव = शिखरकी भाँति उन्नत है, वाजिनि = अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमे, स्वमृतम् इव = जैसे उत्तम अमृत है उसी प्रकार मैं भी, ऊर्ध्वपवित्रः अस्मि = अतिशय पवित्र अमृतरूप हूँ, (तथा मैं) सवर्चसम् = प्रकाशयुक्त; द्रविणम् = धनका भडार हूँ, अमृतोक्षितः = ( परमानन्दमय ) अमृतसे अभिसिञ्चित; ( तथा ) सुमेधाः = श्रेष्ठ बुद्धि- वाला हूँ, इति = इस प्रकार (यह), त्रिशङ्कोः = त्रिशङ्कु ऋषिका; वेदानुवचनम् = अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है। व्याख्या—त्रिशङ्कु नामक ऋषिने परमात्माको प्राप्त होकर जो अपना अनुभव व्यक्त किया था, उसे ही इस अनुवाक- में उद्धृत किया गया है । त्रिशङ्कुके वचनानुसार अपने अन्त:करणमें भावना करना भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन है, यही बतानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ हुआ है। श्रुतिका भावार्थ यह है कि मैं प्रवाहरूपमें अनादिकालसे चले आते हुए इस जन्म-मृत्युरूप ससारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ । यह मेरा अन्तिम जन्म है। इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होनेका। मेरी कीर्ति पर्वत शिखरकी भाँति उन्नत एव विशाल है। अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमे जैसे उत्तम अमृतका निवास है, उसी प्रकार मैं भी विशुद्ध—रोग दोष आदिसे सर्वथा मुक्त हूँ, अमृतरूप हूँ। इसके सिवा मैं प्रकाशयुक्त धनका भडार हूँ, परमानन्दरूप अमृतमें निमग्न और श्रेष्ठ धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न हूँ। इस प्रकार यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके बाद व्यक्त किया हुआ आत्माका उद्गार है। मनुष्य जिस प्रकारकी भावना करता है, वैसा ही बन जाता है, उसके संकल्पमें यह अपूर्व—आश्चर्यजनक शक्ति है। अतः जो मनुष्य अपनेमें उपर्युक्त भावनाका अभ्यास करेगा, वह निश्चय वैसा ही बन जायगा । परंतु इस साधनमें पूर्ण