भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 832 में से

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पृष्ठ 356
  • ३३० *- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम् । हिया भिया देयम् । संविदा देयम् । मातृदेवः भव=तुम मातामे देवबुद्धि करनेवाले बनो, पितृदेवः=पिताको देवरूप समझनेवाले, भव=होओ; आचार्यदेवः=आचार्यको देवरूप समझनेवाले, भव=बनो, अतिथिदेवः= अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले, भव=होओ; यानि=जो जो, अनवद्यानि=निर्दोष, कर्माणि=कर्म हैं, तानि=उन्हेंही, सेवितव्यानि=तुम्हें सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरे ( दोषयुक्त ) कर्मोंका, नो=कभी आचरण नहीं करना चाहिये, अस्माकम्=हमारे ( आचरणोंमेंसे भी ); यानि=जो-जो, सुचरितानि=अच्छे आचरण हैं तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका, नो=कभी नहीं, ये=जो, के=कोई, च=भी, अस्मत्=हमसे, श्रेयांसः= श्रेष्ठ ( गुरुजन एव ); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आयें, तेषाम्=उनको, त्वया=तुम्हें, आसनेन=आसन दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रश्वसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये, अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके, अदेयम्= नहीं देना चाहिये, श्रिया=आर्थिक स्थितिके अनुसार, देयम्=देना चाहिये, हिया=लज्जासे, [देयम्=देना चाहिये;] भिया भयसे भी, देयम्=देना चाहिये, (और) सविदा=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक, देयम्= देना चाहिये। व्याख्या-पुत्र ! तुम मातामे देवबुद्धि रखना, पितामे भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमे देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना, इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्‌में जो-जो निर्दोष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त-निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर-स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे-अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम-शास्त्र एव शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ-वय, विद्या, तप, आचरण आदिमे बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्ध्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये, क्योकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७।२७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये। अर्थात् सारा धन भगवान्‌का है, मैने इसे अपना मानकर उनका अपराध किया है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमे स्थित भगवान्‌की सेवामे ही लगाना उचित था, मैने ऐसा नहीं किया। मै जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर सङ्कोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमे दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अत' दान लेनेवाले भी भगवान् ही है। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दान स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान्‌से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय-वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्‌की प्रीतिका-कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।