कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 357, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 357
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३१ अथ= इसके बाद, यदि = यदि, ते = तुमको, कर्मविचिकित्सा = कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो; वा = या, वृत्तविचिकित्सा = सदाचारके विषयमे कोई शङ्का, वा = कदाचित्; स्यात् = हो जाय तो, तत्र = वहाँ, ये = जो; संमर्शिनः = उत्तम विचारवाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = कर्म और सदाचारमे पूर्णतया लगे हुए; अलूक्षाः = स्निग्ध स्वभाववाले, (तथा) धर्मकामाः = एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः = ब्राह्मण, स्युः = हों; ते = वे, यथा = जिस प्रकार, तत्र = उन कर्मोमे और आचरणोंमें, वर्तेरन् = बर्ताव करते हों, तत्र = उन कर्मों और आचरणोंमें; तथा = वैसे ही; वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ = तथा यदि, अभ्याख्यातेषु = किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमे (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी), ये = जो, तत्र = वहाँ, संमर्शिनः = उत्तम विचार- वाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए, अलूक्षाः = रूखेपनसे रहित, धर्मकामाः = धर्मके अभिलाषी, ब्राह्मणाः = (विद्वान्) ब्राह्मण, स्युः = हो, ते = वे, यथा = जिस प्रकार; तेषु = उनके साथ, वर्तेरन् = बर्ताव करें, तेषु = उनके साथ, तथा = वैसा ही, वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; एषः = यह, आदेशः = शास्त्रकी आज्ञा है, एषः = यही, उपदेशः = (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश है; एषा = यही, वेदोपनिषत् = वेदोंका रहस्य है, च = और, एतत् = यही, अनुशासनम् = परम्परागत शिक्षा है, एवम् = इसी प्रकार; उपासितव्यम् = तुमको अनुष्ठान करना चाहिये, एवम् उ = इसी प्रकार, एतत् = यह; उपास्यम् = अनुष्ठान करना चाहिये। व्याख्या - यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमे दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय - तुम किंकर्तव्यविमूढ हो जाओ, तो ऐसी स्थितिमे वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्म-पालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई वैसे ही महापुरुष) हों - वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हे भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किम समय कैसा व्यवहार करना चाहिये - इस विषयमे भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय - तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा धर्मकामी (सासारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है। यही शास्त्रकी आज्ञा है - आज्ञाओंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और सन्तानोके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। ॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥ द्वादश अनुवाक शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! नः = हमारे लिये, मित्रः = (दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता, शम् [भवतु]= कल्याणप्रद हों, (तथा) वरुणः = (रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी, शम् [भवतु]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा = (चक्षु और