भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 832 में से

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पृष्ठ 358

३३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा, नः = हमारे लिये, शम् = कल्याणमय, भवतु = हों, इन्द्रः = (बल और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र, (तथा) बृहस्पतिः = (वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति, नः = हमारे लिये, शम् [भवताम्]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों, उरुक्रमः = त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले, विष्णुः = विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं), नः = हमारे लिये; शम् [भवतु]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः = नमस्कार है; वायो = हे वायुदेव, ते=तुम्हारे लिये, नमः = नमस्कार है, त्वम् = तुम, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले), ब्रह्मा = ब्रह्म; असि = हो, (इसलिये मैने) त्वाम् = तुमको, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष, ब्रह्म = ब्रह्म, अवादिषम् = कहा है, ऋतम् = (तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे, अवादिषम् = पुकारा है; सत्यम् =(तुम- सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैने तुम्हें) सत्य नामसे, अवादिषम् = कहा है; तत् = उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम् आवीत् = मेरी रक्षा की है; तत् = उसने, वक्तारम् आवीत् = वक्ताकी-आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम् = रक्षा की है मेरी, (और) आवीत् वक्तारम् = रक्षा की है मेरे आचार्यकी, ॐ शान्तिः = भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः = शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिः = शान्तिस्वरूप हैं।

व्याख्या-शिक्षावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों-हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं-'हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ही समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, अतः मैने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहकर पुकारा है। मैने ऋत नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके आप ही अधिष्ठाता हैं। यही नहीं, मैंने 'सत्य' नामसे भी आपको ही पुकारा है, क्योंकि सत्य-यथार्थ भाषणके अधिष्ठातृ-देवता भी आप ही है। उन सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरने मुझे सत्-आचरण एव सत्य भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा की है। तथा मेरे आचार्यको उन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा-उनका भी सब प्रकारसे कल्याण किया है। यहाँ 'मेरी रक्षा की है, मेरे वक्ताकी रक्षा की है' इन वाक्योंको दुहरानेका अभिप्राय शिक्षावल्लीकी समाप्तिकी सूचना देना है।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः-इस प्रकार तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण करनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं। अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।

द्वादश अनुवाक समाप्त ॥ १२ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥