कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ ब्रह्मानन्दवल्ली शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया । प्रथम अनुवाक ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाभ्युक्ता । ब्रह्मवित् = ब्रह्मज्ञानी; परम् = परब्रह्मको; आप्नोति = प्राप्त कर लेता है; तत् = उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा = यह ( श्रुति ); अभ्युक्ता = कही गयी है । व्याख्या-ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह विपश्चितेति । ब्रह्म = ब्रह्म; सत्यम् = सत्य; ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप; ( और ) अनन्तम् = अनन्त है; यः = जो मनुष्य; परमे व्योमन् = परम विशुद्ध आकाशमें ( रहते हुए भी ); गुहायाम् = प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम् = छिपे हुए ( उस ब्रह्मको ); वेद = जानता है; सः = वह; विपश्चिता = ( उस ) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह = ब्रह्मके साथ; सर्वान् = समस्त; कामान् अश्नुते = भोगोंका अनुभव करता है; इति = इस प्रकार ( यह ऋचा है )। व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है । भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका बोधक है । अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं, किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता । तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें अज्ञानका लेश भी नहीं है। और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत-सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं । उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक तत्त्वसे जान लेता है, वह भलीभाँति सबको जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे अनुभव करता है* ।
- इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्योपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका रहस्य भी स्पष्ट हो जाता है । वहाँ कहा है कि इस भूतलपर जो कुछ भी जड-चेतनमय जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उन्हें अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये । जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति बतानेके लिये कही गयी है । 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है । उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये भी अलग नहीं होता, अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लेप रहता है । यही भाव दिखानेके लिये 'विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अश्नुते' कहा गया है । इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है ।