कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 361, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 361
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३५ ये = जो साधक, अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है; [इति = इस भावसे,] उपासते = (उसकी) उपासना करते हैं, ते = वे, वै = अवश्य ही; सर्वम् = समस्त, अन्नम् = अन्नको, आप्नुवन्ति = प्राप्त कर लेते हैं; हि = क्योंकि, अन्नम् = अन्न ही, भूतानाम् = भूतोंमें; ज्येष्ठम् = श्रेष्ठ है; तस्मात् = इसलिये, सर्वौषधम् = ( यह ) सर्वौषध नामसे, उच्यते = कहा जाता है, अन्नात् = अन्नसे ही; भूतानि = सब प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, अन्नेन = अन्नसे ही; वर्धन्ते = बढ़ते हैं, तत् = वह; अद्यते = ( प्राणियोंद्वारा ) खाया जाता है, च = तथा, भूतानि = ( स्वय भी ) प्राणियोंको, अत्ति = खाता है; तस्मात् = इसलिये, अन्नम् = 'अन्न'; इति = इस नामसे, उच्यते = कहा जाता है। व्याख्या - इस मन्त्रमे अन्नकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अन्नसे ही उत्पन्न हुए हैं - अन्नके परिणामस्वरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अन्नसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अन्नसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमे इस अन्नमे ही - अन्न उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं, और स्थूलशरीर अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही जीते हैं तथा अन्नके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अन्नमें विलीन नहीं होते, वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं। इस प्रकार यह अन्न समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वौषधरूप कहलाता है - क्योंकि इसीसे प्राणियोंका क्षुधर्ाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल क्षुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर हो जाते हैं। जो साधक इस अन्नकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अन्न ही सर्वश्रेष्ठ है, सबने बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अन्नको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अन्न प्राप्त हो जाता है, अन्नका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अन्न ही सब भूतोंमे श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वौषधमय कहलाता है। तथा सब प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अन्नसे ही बढ़ते हैं - उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अन्नसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं, तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता - अपनेमें विलीन कर लेता है। इसीलिये 'अद्यते, अत्ति च इति अन्नम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अन्न है। तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै = निश्चय ही, तस्मात् = उस, एतस्मात् = इस, अन्नरसमयात् = अन्न-रसमय मनुष्यशरीरसे, अन्यः = भिन्न; अन्तरः = उसके भीतर रहनेवाला, प्राणमयः आत्मा = प्राणमय पुरुष है; तेन = उससे, एषः = यह ( अन्न-रसमय पुरुष ); पूर्णः = व्याप्त है, सः = वह, एषः = यह प्राणमय आत्मा, वै = निश्चय ही, पुरुषविधः एव = पुरुषके आकारका ही है, तस्य = उस ( अन्न-रसमय ) आत्माकी, पुरुषविधताम् = पुरुषतुल्य आकृतिमें, अनु = अनुगत ( व्याप्त ) होनेसे ही, अयम् = यह; पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस ( प्राणमय आत्मा ) का, प्राणः = प्राण, एव = ही, शिरः = ( मानो ) शिर है; व्यानः = व्यान, दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पख है, अपानः = अपान, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है, आकाशः = आकाश, आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, ( और ) पृथिवी = पृथ्वी, पुच्छम् = पूँछ, ( एवम् ) प्रतिष्ठा = आधार है; तत् = उस प्राण ( की महिमा ) के विषयमें, अपि = भी, एषः = यह आगे बताया जानेवाला, श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या - द्वितीय अनुवाकके इस दूसरे अशंमें प्राणमय शरीरका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पूर्वोक्त अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरसे भिन्न उस स्थूलशरीरके भीतर रहनेवाला एक और शरीर है, उसका नाम 'प्राणमय' है, उस प्राणमयसे यह अन्नमय शरीर पूर्ण है। अन्नमय स्थूलशरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण प्राणमय शरीर इसके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त है। वह यह प्राणमय शरीर भी पुरुषके आकारका ही है। अन्नमय शरीरकी पुरुषाकारता प्रसिद्ध है, उसमें अनुगत होनेसे ही यह प्राणमय कोश भी पुरुषाकार कहा जाता है। उसकी पक्षीके रूपमें कल्पना इस प्रकार हैं-