भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

३९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

सूक्ष्म, बहूनि एव=बहुत-से; रूपाणि=रूपों (आकृतियों, शरीरों) को; वृणोति=स्वीकार करता है; तेषाम्=उनके; संयोगहेतुः=संयोगका कारण; अपरः=दूसरा; अपि=भी; दृष्टः=देखा गया है ॥ १२ ॥ व्याख्या-जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे और बुद्धि, मन, इन्द्रिय तथा पञ्चभूत-इनके समुदाय- रूप शरीरके धर्मोंसे युक्त होनेके कारण अहंता-ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर अनेकानेक शरीर धारण करता है । अर्थात् शरीरके धर्मोंमें अहंता-ममता करके तद्रूप हो जानेके कारण नाना प्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है-अपने कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है । परंतु इस प्रकार जन्म लेनेमें यह स्वतन्त्र नहीं है; इसके संकल्प और कर्मोंके अनुसार उन-उन योनियोंसे इसका सम्बन्ध जोड़नेवाला कोई दूसरा ही है । वे हैं पूर्वोक्त परमेश्वर, जिन्हें तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंने देखा है । वे इस रहस्यको भलीभाँति जानते हैं । यहाँ कर्मोंके संस्कारोंका नाम क्रिया-गुण है, समस्त तत्त्वोंके समुदायरूप शरीरकी देखना, सुनना, समझना आदि शक्तियोंका नाम आत्मगुण है और इनके सम्बन्धसे जीवात्मामें जो अहंता, ममता, आसक्ति आदि आ जाते हैं-उनका नाम स्वगुण है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध-अनादिकालसे चले आने हुए इस जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका क्या उपाय है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है- अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ कलिलस्य=कलिल (दुर्गम संसार) के; मध्ये=भीतर व्याप्त; अनाद्यनन्तम्=आदि-अन्तसे रहित; विश्वस्य स्रष्टारम्=समस्त जगत्की रचना करनेवाले; अनेकरूपम्=अनेकरूपधारी; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्= समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे हुए; एकम्=एक (अद्वितीय); देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या-पूर्वेमन्त्रमें जिनको इस जीवात्माका नाना योनियोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला बताया गया है, जो अन्तर्यामी- रूपसे मनुष्यके हृदयरूप गुहामें स्थित तथा निराकाररूपसे इस समस्त जगत्‌में व्याप्त हैं, जिनका न तो आदि है और न अन्त ही है अर्थात् जो उत्पत्ति, विनाश और वृद्धि-क्षय आदि सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य-सदा एकरस रहनेवाले हैं, तथापि जो समस्त जगत्‌की रचना करके विविध जीवोंके रूपमें प्रकट होते हैं और जिन्होंने इस समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेर रक्खा है, उन एकमात्र सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, सबका शासन करनेवाले, सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानकर यह जीवात्मा सदाके लिये समस्त बन्धनोंसे सर्वथा छूट जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध-अब अध्यायके उपसहारमें ऊपर कही हुई बातको पुन स्पष्ट करते हुए परमात्माकी प्राप्तिका उपाय बताया जाता है- भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्यम्=श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होने योग्य; अनीडाख्यम्=आश्रयरहित कहे जानेवाले; (तथा) भावाभावकरम्=जगत्‌की उत्पत्ति और सहार करनेवाले; शिवम्=कल्याणस्वरूप; (तथा) कलासर्गकरम्= सोलह कलाओंकी रचना करनेवाले; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ये=जो साधक; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; तनुम्= शरीरको; (सदाके लिये) जहुः=त्याग देते हैं-जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म परमेश्वर आश्रयरहित अर्थात् शरीररहित हैं, यह प्रसिद्ध है, तथा वे जगत्‌की उत्पत्ति और सहार करनेवाले तथा (प्रश्नोपनिषद् ६।६।४ में बतायी हुई) सोलह कलाओंको भी उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी वे कल्याणस्वरूप आनन्दमय परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति और प्रेमभावसे पकड़े जा सकते हैं, जो मनुष्य उन परमदेव परमेश्वरको जान लेते हैं, वे शरीरसे अपना सम्बन्ध सदाके लिये छोड़ देते हैं अर्थात् इस संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाते हैं।