भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 425
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९७ इस रहस्यको समझकर मनुष्यको जितना शीघ्र हो सके, उन परम सुहृद्, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर परमात्माको जानने और पानेके लिये व्याकुल हो श्रद्धा और भक्तिभावसे उनकी आराधनामें लग जाना चाहिये ॥१४॥ ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥ ❖ अध्याय स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ एके = कितने ही; कवयः = बुद्धिमान् लोग; स्वभावम् = स्वभावको; वदन्ति = जगत्का कारण बताते हैं; तथा = उसी प्रकार; अन्ये = कुछ दूसरे लोग; कालम् = कालको जगत्का कारण बतलाते हैं; [ एते ] परिमुह्यमानाः [ सन्ति ] = ( वास्तवमे ) ये लोग मोहग्रस्त हैं (अतः वास्तविक कारणको नहीं जानते ), तु = वास्तवमे तो; एषः = यह; देवस्य = परमदेव परमेश्वरकी, लोके = समस्त जगत्में फैली हुई, महिमा = महिमा है; येन = जिसके द्वारा; इदम् = यह; ब्रह्मचक्रम् = ब्रह्मचक्र; भ्राम्यते = घुमाया जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—कितने ही बुद्धिमान् लोग तो कहते हैं कि इस जगत्का कारण स्वभाव है। अर्थात् पदार्थोंमें जो स्वाभाविक शक्ति है—जैसे अग्निमें प्रकाशन-शक्ति और दाह-शक्ति, वही इस जगत्का कारण है। कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि काल ही जगत्का कारण है, क्योंकि समयपर ही वस्तुगत शक्तिका प्राकट्य होता है, जैसे वृक्षमें फल आदि उत्पन्न करनेकी शक्ति समयपर ही प्रकट होती है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें गर्भाधान ऋतुकालमें ही होता है, असमयमें नहीं होता—यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये वैज्ञानिक मोहमें पड़े हुए हैं, अतः ये इस जगत्के वास्तविक कारणको नहीं जानते। वास्तवमे तो यह परमदेव सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ही महिमा है, जगत्की विचित्र रचनाको देखने और उसपर विचार करनेपर उन्हींका महत्त्व प्रकट होता है। वे स्वभाव और काल आदि समस्त कारणोंके अधिपति हैं और उन्हींके द्वारा यह संसार-चक्र घुमाया जाता है। इस रहस्यको समझकर इस चक्रसे छुटकारा पानेके लिये उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। संसार-चक्रकी व्याख्या १। ४ में की गयी है ॥ १ ॥ येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥ येन = जिस परमेश्वरसे; इदम् = यह, सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; नित्यम् = सदा; आवृतम् = व्याप्त है, यः = जो, ज्ञः = ज्ञानस्वरूप परमेश्वर; हि = निश्चय ही; कालकालः = कालका भी महाकाल; गुणी = सर्वगुणसम्पन्न, (और) सर्वविद्यः = सबको जाननेवाला है, तेन = उससे; ह = ही, ईशितम् = शासित हुआ, कर्म = यह जगत्रूप कर्म, विवर्तते = विभिन्न प्रकारसे यथायोग्य चल रहा है, (और ये) पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि = पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश भी ( उसीके द्वारा शासित होते हैं); [ इति = इस प्रकार, ] चिन्त्यम् = चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ व्याख्या—जिन जगन्नियन्ता जगदाधार परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा—सभी अवस्थाओंमें सर्वथा व्याप्त है, जो कालके भी महाकाल हैं—अर्थात् जो कालकी सीमासे परे हैं, जो ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्मा सुहृदता आदि समस्त दिव्य गुणोंसे नित्य सम्पन्न हैं, समस्त गुण जिनके स्वरूपभूत और चिन्मय हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डोंको भली प्रकारसे जानते हैं, उन्हींका चलाया हुआ यह जगत्-चक्र नियमपूर्वक चल रहा है। वे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंपर शासन करते हुए इनको अपना-अपना कार्य करनेकी शक्ति देकर इनसे कार्य करवाते हैं। उनकी शक्तिके बिना ये कुछ भी नहीं कर सकते, यह बात केनोपनिषद्में यक्षके आख्यानद्वारा भलीभाँति समझायी गयी है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका उपर्युक्तभावसे चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मः ॥ ३ ॥