कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * (परमात्माने ही) तत्=उस (जडतत्त्वोंकी रचनारूप), कर्म=कर्मको; कृत्वा=करके; विनिवर्त्य=उसका निरीक्षण कर, भूयः=फिर; तत्त्वस्य=चेतन तत्त्वका, तत्त्वेन=जड तत्त्वसे, योगम्=सयोग; समेत्य=कराके, वा=अथवा यों समझिये कि, एकेन=एक (अविद्या) से, द्वाभ्याम्=दो (पुण्य और पापरूप कर्मों) से, त्रिभिः=तीन गुणोंसे; च=और, अष्टभिः=आठ प्रकृतियोंके साथ, च=तथा, कालेन=कालके साथ, एव=और, सूक्ष्मैः आत्मगुणैः= आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंके साथ, [ एव=भी, ] [ योगम् समेत्य=इस जीवका सम्बन्ध कराके ] (इस जगत्की रचना की है) ॥ ३ ॥ व्याख्या—परमेश्वरने ही अपनी शक्तिभूता मूलप्रकृतिसे पाँचों स्थूल महाभूत आदिकी रचनारूप कर्म करके उसका निरीक्षण किया, फिर जड तत्त्वके साथ चेतन तत्त्वका सयोग कराके नाना रूपोंमें अनुभव होनेवाले विचित्र जगत्की रचना की।* अथवा इस प्रकार समझना चाहिये कि एक अविद्या, दो पुण्य और पापरूप सचित कर्म-सस्कार, सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण और एक काल तथा मन, बुद्धि, अहकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृतिभेद, इन सनसे तथा अहता, ममता, आसक्ति आदि आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंसे जीवात्माका सम्बन्ध कराके इस जगत्की रचना की । इन दोनों प्रकारके वर्णनोंका तात्पर्य एक ही है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—इस रहस्यको समझकर साधकको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है— आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥४॥ यः=जो साधक; गुणान्वितानि=सत्त्वादि गुणोंसे व्याप्त; कर्माणि=कर्मोंको, आरभ्य=आरम्भ करके; (उनको) च=तथा, सर्वान्=समस्त, भावान्=भावोंको; विनियोजयेत्=परमात्मामें लगा देता है—उसीके समर्पण कर देता है, (उसके इस समर्पणसे) तेषाम्=उन कर्मोंका, अभावे=अभाव हो जानेपर; (उस साधकके) कृतकर्मनाशः=पूर्वसंचित कर्म-समुदायका भी सर्वथा नाश हो जाता है, कर्मक्षये=(इस प्रकार) कर्मोंका नाश हो जानेपर, सः=वह साधक; याति=परमात्माको प्राप्त हो जाता है, (क्योंकि वह जीवात्मा) तत्त्वतः= वास्तवमें, अन्यः=समस्त जड-समुदायसे भिन्न (चेतन) है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जो कर्मयोगी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे व्याप्त अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुकूल कर्तव्यकर्मोंका आरम्भ करके उनको और अपने सब प्रकारके अहता, ममता, आसक्ति आदि भावोंको उस परब्रह्म परमेश्वरमें लगा देता है, उनके समर्पण कर देता है, उस समर्पणसे उन कर्मोंके साथ साधकका सम्बन्ध न रहनेके कारण वे उसे फल नहीं देते । इस प्रकार उनका अभाव हो जानेसे पहले किये हुए सचित कर्म-सस्कारोंका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेसे वह तुरत परमात्माको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि यह जीवात्मा वास्तवमें जड-तत्त्वसमुदायसे सर्वथा भिन्न एव अत्यन्त विलक्षण है। उनके साथ इसका सम्बन्ध अज्ञानजनित अहता-ममता आदिके कारण ही है, स्वाभाविक नहीं है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—कर्मयोगका वर्णन करके अब उपासनारूप दूसरा साधन बताया जाता है— आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५॥ सः=वह, आदिः=आदि कारण (परमात्मा), त्रिकालात् परः=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एव) अकलः= कलारहित (होनेपर), अपि=भी, संयोगनिमित्तहेतुः=प्रकृतिके साथ जीवका सयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्टः=देखा गया है, स्वचित्तस्थम्=अपने अन्तःकरणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप, (एव) भवभूतम्=
- इसका वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक १ और ६) में, ऐतरेयोपनिषद् (अध्याय १ के तीनों खण्डों) में, छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय ६, खण्ड २-३) में और बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण २ ) में भी विस्तारपूर्वक आया है।