कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 427, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 427
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९९ जगत्रूपमें प्रकट, ईड्यम्=स्तुति करने योग्य, पूर्वम्=पुराणपुरुष, देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये) ॥ ५ ॥ व्याख्या-वे समस्त जगत्के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही है। वे (प्रश्नोपनिषद्में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे ही एकमात्र स्तुति करने योग्य हैं। उन्हें ढूँढनेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान् परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है- स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥ यस्मात्=जिससे, अयम्=यह; प्रपञ्चः=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है, सः=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभिः=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे, परः=सर्वथा अतीत; (एव) अन्यः=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले, पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले, भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्के आधारभूत परमात्माको, आत्मस्थम्=अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर, (साधक) अमृतम् [प्रति]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-जिनकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है-प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसार-वृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं। अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एव आकाररहित हैं। तथापि वे धर्मकी वृद्धि एव पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्योंके अधिपति और समस्त जगत्के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्यामीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥६॥ सम्बन्ध-पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मालोग कहते हैं- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ तम्=उस, ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम, महेश्वरम्=महेश्वर, देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके, च=भी; परमम्=परम, दैवतम्=देवता, पतीनाम्=पतियोंके भी, परमम्=परम, पतिम्=पति, (तथा) भुवनेशम्= समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी, (एव) ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य, तम्=उस, देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको, (हमलोग) परस्तात्=सबसे परे, विदाम=जानते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके-लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों-रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य प्रकाशस्वरूप परम देव परमात्माको हमलोग सबसे पर जानते हैं। उनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे ही इस जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारण हैं और वे सर्वरूप होकर भी सबसे सर्वथा पृथक हैं ॥ ७ ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८॥