कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना करनेवाले साधकको इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये कि जो (पहले बतायी हुई) सोलह कलाओंसे अर्थात् संसारके सम्बन्धसे रहित, सर्वथा क्रियाशून्य, परम शान्त और सब प्रकारके दोषोंसे रहित है, जो अमृतस्वरूप मोक्षके परम सेतु है अर्थात् जिनका आश्रय लेकर मनुष्य अत्यन्त सुगमतापूर्वक इस संसार-समुद्रसे पार हो सकता है, जो लकड़ीका पार्थिव अंश जल जानेके बाद धधकते हुए अंगारोंवाली अग्निकी भाँति सर्वथा निर्विकार, निर्मल प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परम चेतन हैं, उन निर्विशेष निर्गुण निराकार परमात्माको तत्त्वसे जाननेके लिये उन्हींको लक्ष्य बनाकर उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १९ ॥ सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही गयी थी कि इस संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये उन परमात्माको जान लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, उसीको दृढ़ किया जाता है— यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥ यदा=जब; मानवाः=मनुष्यगण; आकाशम्=आकाशको; चर्मवत्=चमड़ेकी भाँति; वेष्टयिष्यन्ति=लपेट सकेंगे; तदा=तब; देवम्=उन परमदेव परमात्माको; अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त; भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥ व्याख्या-जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लपेटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर भी इस कार्यको नहीं कर सकते; उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःख-समुद्रसे पार नहीं हो सकता। अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हीं को जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥ तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान्। अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥ ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपःप्रभावात्=तपके प्रभावसे, च=और; देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्घ- जुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=उत्तमरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥ व्याख्या-यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयम- मय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥ वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्। नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥२२॥ [इदम्=यह;] परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्पे=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा= अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो; उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥ व्याख्या-यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषदोंमें भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव