भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 832 में से

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पृष्ठ 433
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०५ यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—'जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये, तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।' भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है, अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥ यस्य = जिसकी, देवे = परमदेव परमेश्वरमे; परा = परम, भक्तिः = भक्ति है; (तथा) यथा = जिस प्रकार; देवे = परमेश्वरमें है, तथा = उसी प्रकार, गुरौ = गुरुमे भी है, तस्य महात्मनः = उस महात्मा पुरुषके हृदयमे, हि = ही; एते = ये; कथिताः = बताये हुए, अर्थाः = रहस्यमय अर्थ, प्रकाशन्ते = प्रकाशित होते हैं, प्रकाशन्ते महात्मनः = उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥ व्याख्या-जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमे परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमे होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमे भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते ह । अतः जिज्ञासु- को पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये । जिसमे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमे ये गूढ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमे अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है।
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