कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ छान्दोग्योपनिषद् यह उपनिषद् सामवेदकी तलवकार शाखाके अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मणका भाग है । छान्दोग्य ब्राह्मणमे कुल दस अध्याय हैं, उनमेंसे पहले और दूसरे अध्यायोंको छोड़कर शेष आठ अध्यायोंका नाम छान्दोग्योपनिषद् है । शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौ- पनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है । प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ओंकारकी व्याख्या
ॐ-रूप इस अक्षरकी उद्गीथ शब्द-वाच्य परमात्माके रूपमे उपासना करनी चाहिये । क्योंकि यज्ञमें उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरका ही सर्व प्रथम उच्चस्वरसे गान करता है। उस ओङ्कारकी व्याख्या आरम्भ की जाती है ॥ १ ॥ इन चराचर जीवोंका रस—आधार पृथ्वी है, पृथ्वीका रस—आधार अथवा कारण जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—उनसे पोषण पानेवाला मनुष्य शरीर है, मनुष्यका रस—प्रधान अङ्ग वाणी है, वाणीका रस—सार ऋचा * है, ऋचाका रस साम है और सामका रस उद्गीथ (ओंकार) है । इनमें जो आठवाँ (सबसे अन्तिम) रस उद्गीथरूप ओंकार है, वह समस्त रसोंमें उत्कृष्ट रस है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ एव परब्रह्म परमात्माका धाम—आश्रय है । अब कौन-कौन ऋचा है, कौन कौन साम है तथा कौन कौन उद्गीथ है—यह विचार किया जाता है । वाणी ही ऋचा है, प्राण साम है, 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है । जो वाणी और प्राण तथा ऋचा और साम ह, यह एक ही जोड़ा है—दो नहीं हैं । अर्थात् वाणी अथवा ऋचा तथा प्राण अथवा साम एक दूसरेके पूरक हैं । वाणी और प्राणका अथवा ऋचा और सामका यह जोड़ा ॐ-रूप इस अक्षरमें भलीभाँति सयुक्त किया जाता है । जिस समय स्त्री और पुरुष आपसमे प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उस समय वे अवश्य ही एक दूसरेकी कामना पूर्ण करते हैं । इसी प्रकार यह वाणी और प्राणका जोड़ा जब ओंकारमे लगाया जाता है, तब वह सदाके लिये पूर्णकाम—कृतकृत्य हो जाता है । इस रहस्यको जानने- वाला जो कोई उपासक इस उद्गीथस्वरूप अविनाशी परमेश्वरकी उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ होता है ॥ २-७ ॥ यह ॐ-रूप अक्षर अनुज्ञा अर्थात् अनुमतिसूचक भी है, क्योंकि मनुष्य जब किसी बातके लिये अनुमति देता है तब 'ओम्' इस शब्दका ही उच्चारण करता है । किसीको कुछ
- जिनके अक्षर, पाद और समाप्ति—ये नियत सख्याके अनुसार होते हैं, उन मन्त्रोंको 'ऋक्' कहते हैं, जिनके अक्षर आदिकी कोई नियत सख्या या क्रम न हो, उन्हें 'यजु' कहते हैं । 'ऋक्' सज्ञक मन्त्रोंमें ही जो गीतप्रधान हैं—गाये जा सकते हैं, उनकी 'साम' सज्ञा है । साम-मन्त्रोंद्वारा विभिन्न देवताओंकी स्तुति की जाती है ।