भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 832 में से

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पृष्ठ 435

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०७ करनेके लिये जो यह अनुज्ञा—अनुमति देना है, वही समृद्धि— बड़प्पनका लक्षण है, अतः इस रहस्यको जाननेवाला जो साधक उद्गीथके रूपमें उस परम अक्षर परमात्माकी उपासना करता है, वह अपनी और दूसरोंकी समस्त कामनाओं—भोग्यवस्तुओं- को बढानेमें समर्थ होता है। ओंकारसे ही ऋक्, यजुः और साम—ये तीनों वेद अथवा इन तीनों वेदोंमें वर्णित यज्ञादि कर्म आरम्भ होते है। इस ओंकाररूप अक्षरकी अर्थात् इसके अर्थभूत अविनाशी परमात्माकी पूजा—प्रीतिकाके लिये, इसीकी महिमा (प्रभाव) एव रस (शक्ति) से 'ॐ' इस प्रकार कहकर 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विक् 'आश्रावण' करता है—मन्त्र सुनाता है, 'ॐ' यों कहकर ही होता नामका ऋत्विक् 'शसन' करता है—मन्त्रोंका पाठ करता है और 'ॐ' यों कहकर ही 'उद्गाता' उद्गीथका गान करता है। जो इस रहस्यको इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता, दोनों इस ओंकारसे ही यज्ञादि कर्म करते हैं, परंतु जानना और न जानना दोनों अलग-अलग हैं । साधक जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक, उसके वास्तविक रहस्यको बतानेवाली विद्याके द्वारा अर्थात् उसके तत्त्वको समझकर करता है, वही अधिक-से-अधिक सामर्थ्ययुक्त होता है। यही इस ओंकाररूप अक्षरकी प्रसिद्ध व्याख्या— उसकी महिमाका वर्णन है ॥ ८–१० ॥

द्वितीय खण्ड ओंकारकी आध्यात्मिक उपासना

यह प्रसिद्ध है कि प्रजापतिकी संतान—देवता और असुर दोनों जब आपसमें लड़ रहे थे, उसी समय देवताओंने उद्गीथ (ओंकार) को ध्येय बनाकर उसकी उपासनारूप यज्ञ किया। उनका उद्देश्य यह था कि 'इस अनुष्ठानद्वारा हमलोग इन असुरोंको परास्त कर देंगे।' उन्होंने नासिकामें रहनेवाले घ्राणेन्द्रियरूप प्राणको उद्गीथ बनाकर उपासना की। तब उस घ्राणेन्द्रियको असुरोंने राग-द्वेषरूप पापसे युक्त कर दिया। घ्राणेन्द्रिय राग-द्वेषसे युक्त है, इसीलिये उसके द्वारा यह जीव अच्छी और बुरी—दोनों प्रकारकी गन्धको ग्रहण करता है। तदनन्तर उन प्रसिद्ध देवताओंने उद्गीथरूपसे वाणीकी उपासना की। असुरोंने उसे भी राग द्वेषसे कलुषित कर दिया। वाणी राग-द्वेषसे कलुषित है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य सत्य और झूठ दोनों बोलता है। इसके बाद देवताओंने उद्गीथरूपसे नेत्रकी उपासना की। उसे भी असुरोंने राग-द्वेषसे मलिन कर दिया। चक्षु-इन्द्रिय राग-द्वेषसे मलिन हो रही है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य—शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके दृश्य देखता है। अबकी बार देवताओंने श्रोत्रकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग द्वेषसे दूषित कर दिया। श्रोत्र इन्द्रिय राग- द्वेषसे दूषित है, इसीलिये मनुष्य उसके द्वारा सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य—दोनों प्रकारके शब्द सुनता है। फिर देवताओंने मनकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग- द्वेषसे अभिभूत कर दिया। मन राग-द्वेषसे अभिभूत है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य मनमें लानेयोग्य और मनमें न लानेयोग्य—दोनो प्रकारके सकल्प करता है। तब देवताओं- ने जो यह मुख्य प्राण है, उसीकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग द्वेषसे युक्त करना चाहा, परंतु उसके समीप जाते ही वे उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गये, जैसे खोदे न जा सकनेवाले सुदृढ पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला चूर-चूर हो जाता है। जिस प्रकार अच्छेद्य पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला छिन्न-भिन्न हो जाता है, ठीक वैसे ही वह मनुष्य भी विध्वस हो जाता है, जो उद्गीथका रहस्य जाननेवालेके विषयमें अहित कामना करता है तथा जो उसे पीड़ा पहुँचाता है, क्योंकि उद्गीथके रहस्यको जाननेवाला मनुष्य मानो अच्छेद्य पत्थर ही है ॥ १–८ ॥ प्राणके द्वारा मनुष्य न तो सुगन्धका अनुभव करता है और न दुर्गन्धका ही, क्योंकि इसके सम्पर्कमें आकर तो राग-द्वेष नष्ट हो जाते हैं। इसके द्वारा मनुष्य जो कुछ खाता और जो कुछ पीता है, उससे वह मन-इन्द्रियादि अन्य प्राणोंकी भी रक्षा करता है। अन्तकालमें इसीको न पाकर अर्थात् इसके न रहनेपर इसके साथ ही अन्य सब प्राणोंको लेकर जीवात्मा भी शरीरसे उत्क्रमण कर जाता है—उसे छोड़कर अन्यत्र चला जाता है। इसीलिये अन्त समयमे जीव अपना मुँह अवश्य खोल देता है। यही प्राणकी महिमा है ॥ ९ ॥ यह प्रसिद्ध है कि अङ्गिरा ऋषिने प्राणको ही प्रतीक बना- कर ओंकारस्वरूप परमात्माकी उपासना की थी। अतः लोग इसीको 'आङ्गिरस'—अङ्गिराका उपास्य मानते हैं, क्योंकि यह समस्त अङ्गोंका रस—पोषक है । इसीसे बृहस्पतिने भी प्राणरूपसे उद्गीथकी—ओंकारवाच्य परमात्माकी उपासना की थी। परंतु लोग प्राणको ही 'बृहस्पति' मानते हैं, क्योंकि वाणीका एक नाम बृहती भी है और उसका यह पति—रक्षक है। इसीसे आयास्य नामके प्रसिद्ध ऋषिने भी प्राणके रूपमे