कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 469, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४३७ द्वादश खण्ड अश्वपति और औपमन्यवका संवाद [राजाने कहा-] 'उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस उपासना करते हो ?' 'पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा-] 'तुम जिस दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही 'सुतेजा' नामसे वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमे सुत, प्रसूत भी कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक और आसुत दिखायी देते हैं। तुम अन्न भक्षण करते हो गिर जाता' ॥ १ २ ॥ त्रयोदश खण्ड अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा- 'प्राचीनयोग्य ! रथ और दासियोंके सहित हार प्राप्त है । तुम अन्न भक्षण तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ ।' [ राजाने वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, कहा-] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। आत्माकी तुम उपासना करते हो, इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत- किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है। खच्चरियोंसे जुता हुआ कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते' ॥१-२॥ चतुर्दश खण्ड अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा- 'वैयाघ्रपद्य ! चलती है । तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी- राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [राजाने कहा-] उपासना करता है, यह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्मा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक् पृथक् उपहार आत्माका प्राण ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता' ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड अश्वपति और जनका संवाद तदनन्तर राजाने जनसे कहा- 'शार्कराक्ष्य ! तुम किस करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा- 'पूज्य राजन् ! करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला-] और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका 'यह निश्चय ही बहुलसञ्ज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और तुम उपासना करते हो। इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण यह भी कहा कि- 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह बहुल हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ १-२ ॥