भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 832 में से

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पृष्ठ 470

४३८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५ षोडश खण्ड अश्वपति और बुडिलका संवाद फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'वैयाघ्रपद्य ! दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है, किंतु यह बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही आत्माका वस्ति ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा वस्तिस्थान फट और पुष्टिमन् हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका जाता' ॥ १-२ ॥ सप्तदश खण्ड अश्वपति और उद्दालकका संवाद तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'गौतम ! और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता राजन् ! मै तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही है। किन्तु यह आत्माके चरण ही है।' ऐसा उसने कहा और प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है। इसीसे तुम प्रजा और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो। तुम अन्न भक्षण करते हो शिथिल हो जाते' ॥ १-२ ॥ अष्टादश खण्ड अश्वपतिक वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश राजाने उनसे कहा—'तुम सब लोग इस वैश्वानर (द्युलोक) है, चक्षु विश्वरूप (सूर्य) है, प्राण पृथग्वर्त्मा आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई (वायु) है, देहका मध्यभाग बहुल (आकाश) है, वस्ति ही 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस रयि (जल) है, पृथिवी ही दोनों चरण ह, वक्षःस्थल वेदी प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त है, लोम दर्भ हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है। उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है और मुख आहवनीय है' ॥ १-२ ॥ एकोनविंश खण्ड 'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति अतः जो अन्न पहले आवे उसका हवन करना चाहिये, द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी ऐसा कहकर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है। प्राणके तृप्त तृप्ति होनेपर स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥ तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा विंश खण्ड 'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है। व्यानके तृप्त तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा