कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 471, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 471
खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३९
दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ पश्चात् वह भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
एकविंश खण्ड 'अपान्याय स्वाहा' से तीसरी आहुति फिर जो तीसरी आहुति दे उसे 'अपान्याय स्वाहा' ऐसा तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [स्वामिभावसे] कहकर देना चाहिये । इससे अपान तृप्त होता है । अपानके तृप्त अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके होता है ॥ १-२ ॥
द्वाविंश खण्ड ‘ स्वाहा' से चौथी आहुति तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे 'समानाय स्वाहा' है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और ऐसा कहकर देना चाहिये । इससे समान तृप्त होता है । पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती होता है ॥ १-२ ॥
त्रयोविंश खण्ड 'उदानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश कहकर देना चाहिये । इससे उदान तृप्त होता है। उदानके [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हे वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्तिके पश्चात् स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
• चतुर्विंश खण्ड भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये इस प्रकार हवन करनेका फल वह, जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें समस्त पाप भस्म हो जाते हैं । अतः वह इस प्रकार जानने- हवन करे, क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जानने- वाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न वाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा । इस विषयमें यह मन्त्र है। और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ १-२ ॥ जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार माताकी इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—जिस प्रकार सींकका उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी अग्निहोत्रकी उपासना अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार करते हैं, अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥ ३-५ ॥
॥ पञ्चम अध्याय ॥ ५ ॥