भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 832 में से

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पृष्ठ 474

४४२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ सप्तम खण्ड मनकी अन्नमयताका निश्चय सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है। तू पन्द्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है, इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा। उसने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला]-'भगवन् ! क्या बोलूँ !' [पिताने कहा-] 'सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो।' तब उसने कहा- 'भगवन् ! मुझे उनका स्फुरण नहीं होता।' वह उससे बोला-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक ही कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ १-३ ॥ उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया। उससे [आरुणिने] कहा-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे बढे हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्नकर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है । इसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओं- मेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी। वह अन्नद्वारा वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी। अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है। अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [श्वेतकेतु] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥४-६॥ अष्टम खण्ड सत्-आत्मा ही सबका मूल है उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेत- केतुसे कहा-'सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नान्त (सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप) को विशेषरूपसे समझ ले; जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है उस समय सोम्य ! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है-यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं, क्योंकि उस समय यह स्व-अपनेको ही प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है उसी प्रकार निश्चय ही सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ १-२ ॥ सकता। अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ! इसी प्रकार सोम्य ! तू अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसन्धान कर। सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ३-४॥ अब जिस समय यह पुरुष 'पिपासति' (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एव पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको 'उदन्या' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है-ऐसा जान, क्योंकि यह मूल- रहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ 'सोम्य ! तू मेरेद्वारा भूख और प्यासको जान। जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' (खाना चाहता है) ऐसे नाम- वाला होता है उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्न- को ले जाता है। जिस प्रकार लोकमें [गौ के जानेवालेको] गोनाय, [अश्व ले जानेवालेको] अश्वनाय और [पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शृङ्ग (अङ्कुर) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल (कारणरहित) नहीं हो सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलकी शोध कर। हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप आयतन और सद्रूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है। हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवताएँ पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत्

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