कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४१ चतुर्थ खण्ड त्रिवृत्करण अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप वह अन्नका है । इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो है; जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्न- गयी, क्योंकि [ विद्युद्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाम- का है। इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि मात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ १-४ ॥ [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल इस ( त्रिवृत्करण ) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । आदित्यका जो रोहित रूप और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्यसे आदित्यत्व कह सकेगा; क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर कुछ जानते थे । जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है— अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल सा है वह जलका रूप है— चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है । इस है—ऐसा उन्होंने जाना है। तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमा- इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों —इतना ही सत्य है । विद्युत्का जो रोहित रूप है वह तेजका देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है जाती है ॥ ५-७ ॥ पञ्चम खण्ड मन अन्नमय, प्राण और वाक् तेजोमय है खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग मध्यम भाग है वह मास हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक् होता है वह मन हो जाता है। पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो हो जाता है । [ इसलिये ] सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जाता है । उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये ।' तब आरुणिने सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है । खाया हुआ 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड मथे जाते हुए दहीका सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है । उसी प्रकार और वह वाणी होता है । इस प्रकार हे सोम्य ! मन अन्नमय हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है । सोम्य ! पीये कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ समझाइये ।' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ १-५ ॥ जाता है; वह प्राण होता है । सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका उ० मं० ५६—