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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४१ चतुर्थ खण्ड त्रिवृत्करण अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप वह अन्नका है । इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो है; जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्न- गयी, क्योंकि [ विद्युद्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाम- का है। इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि मात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ १-४ ॥ [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल इस ( त्रिवृत्करण ) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । आदित्यका जो रोहित रूप और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्यसे आदित्यत्व कह सकेगा; क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर कुछ जानते थे । जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है— अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल सा है वह जलका रूप है— चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है । इस है—ऐसा उन्होंने जाना है। तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमा- इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों —इतना ही सत्य है । विद्युत्का जो रोहित रूप है वह तेजका देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है जाती है ॥ ५-७ ॥ पञ्चम खण्ड मन अन्नमय, प्राण और वाक् तेजोमय है खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग मध्यम भाग है वह मास हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक् होता है वह मन हो जाता है। पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो हो जाता है । [ इसलिये ] सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जाता है । उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये ।' तब आरुणिने सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है । खाया हुआ 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड मथे जाते हुए दहीका सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है । उसी प्रकार और वह वाणी होता है । इस प्रकार हे सोम्य ! मन अन्नमय हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है । सोम्य ! पीये कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ समझाइये ।' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ १-५ ॥ जाता है; वह प्राण होता है । सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका उ० मं० ५६—

४४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

४४२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ सप्तम खण्ड मनकी अन्नमयताका निश्चय सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है। तू पन्द्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है, इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा। उसने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला]-'भगवन् ! क्या बोलूँ !' [पिताने कहा-] 'सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो।' तब उसने कहा- 'भगवन् ! मुझे उनका स्फुरण नहीं होता।' वह उससे बोला-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक ही कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ १-३ ॥ उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया। उससे [आरुणिने] कहा-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे बढे हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्नकर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है । इसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओं- मेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी। वह अन्नद्वारा वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी। अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है। अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [श्वेतकेतु] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥४-६॥ अष्टम खण्ड सत्-आत्मा ही सबका मूल है उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेत- केतुसे कहा-'सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नान्त (सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप) को विशेषरूपसे समझ ले; जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है उस समय सोम्य ! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है-यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं, क्योंकि उस समय यह स्व-अपनेको ही प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है उसी प्रकार निश्चय ही सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ १-२ ॥ सकता। अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ! इसी प्रकार सोम्य ! तू अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसन्धान कर। सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ३-४॥ अब जिस समय यह पुरुष 'पिपासति' (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एव पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको 'उदन्या' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है-ऐसा जान, क्योंकि यह मूल- रहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ 'सोम्य ! तू मेरेद्वारा भूख और प्यासको जान। जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' (खाना चाहता है) ऐसे नाम- वाला होता है उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्न- को ले जाता है। जिस प्रकार लोकमें [गौ के जानेवालेको] गोनाय, [अश्व ले जानेवालेको] अश्वनाय और [पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शृङ्ग (अङ्कुर) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल (कारणरहित) नहीं हो सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलकी शोध कर। हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप आयतन और सद्रूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है। हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवताएँ पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत्

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४३ हो जाती हैं वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य ! मरणको सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा है । वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह कहा ॥ ६-७ ॥ नवम खण्ड मधुका दृष्टान्त सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न करती हैं पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुप्ति आदिसे पूर्व ] तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ॥ १-३ ॥ देती हैं । वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मै इस वृक्षका रस हूँ और मै इस सत्य है, वह आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणिके वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर सत्‌को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा गये हैं । वे इस लोकमें व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, कहा ॥ ४ ॥ दशम खण्ड नदियोंका सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती सत्‌के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे ही निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही फिर हो जाते हैं। वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही जानतीं कि 'यह मैं हूँ, यह मैं हूँ' । ठीक इसी प्रकार सोम्य ! तू है । [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्‌से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ एकादश खण्ड वृक्षका हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है। 'सोम्य ! करे तो यह जीवित रहते हुए केवल रसस्त्राव करेगा और यदि ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा, रसस्त्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है । यदि इस वृक्षकी वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे कहा ॥ १-३ ॥ द्वादश खण्ड वट-बीजका दृष्टान्त इस ( सामनेवाले वटवृक्ष ) से एक बड़का फल ले आ । फोड़।' [श्वेत०—] 'भगवन् ! फोड़ दिया ।' [आरुणि—] श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया ।' [ आरुणि—] 'इसे 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये

४४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

४४८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ अणुके समान दाने हैं। [अरुणि-] 'अच्छा, वत्स ! सोम्य ! तू [ इस कथनमे ] श्रद्धा कर।' वह जो यह अणिमा इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०-] 'फोड़ दिया भगवन् !' है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और [आरुणि-] 'इसमें क्या देखता है ? [श्वेत०-] 'कुछ श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर नहीं भगवन् ! तब उससे [आरुणिने] कहा-'हे सोम्य ! श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता सोम्य ! उस आरुणिने ] 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है। हे त्रयोदश खण्ड नमकका दृष्टान्त 'इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-] आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही 'अच्छा अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।' उसने वैसा किया। तब आरुणिने उससे कहा-'वत्स ! रात तुमने जो ही किया [और बोला-] 'उस जलमे नमक सदा ही नमक जलमें डाला था उसे ले आओ। किंतु उसने ढूँढ़नेपर विद्यमान था। तब उससे पिताने कहा-'सोम्य ! उसे उसमें न पाया। [आरुणि-] 'जिस प्रकार वह नमक [इसी प्रकार] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे इसीमें विलीन हो गया है [इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख देखता नहीं है; परन्तु वह निश्चय यहीं विद्यमान है।' वह जो सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो] इस जलको ऊपरसे यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आचमन कर।' [उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा-] आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस 'कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-] प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर 'बीचमेंसे आचमन कर' 'अब कैसा है ?' [श्वेत०-] समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा 'नमकीन है।' [आरुणि-] 'नीचेसे आचमन कर' 'अब कहा ॥ १-३ ॥ चतुर्दश खण्ड आँख बँधे हुए पुरुषका दृष्टान्त हे सोम्य ! जिस प्रकार [कोई चोर ] जिसकी आँखें ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को ] जानता है; उसके स्थानमें छोड़ दे। उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व उत्तर, लिये [मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे [देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है। वह जो यह अणिमा छोड़ दिया गया है। उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर जा तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ पञ्चदश खण्ड मुमूर्षु का दृष्टान्त सोम्य ! [ज्वरादिसे ] सन्तप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं-'क्या तू मुझे लेता है। फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ! जबतक उसकी है तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमे जाता है, तब वह नहीं पहचानता। वह जो यह अणिमा है,

खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४५ एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ ००९०० षोडश खण्ड मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है। वह जिस (चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रकार उस [ परीक्षाके ] समय नहीं जलता [ उसी प्रकार प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको विद्वान्का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है ]। मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है, किंतु यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है। और यदि वह श्वेतकेतो ! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको गया—उसे जान गया ॥ १-३ ॥

॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अध्याय

ॐ सप्तम अध्याय प्रथम खण्ड नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना 'भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये' ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये । उनसे सनत्कुमारजीने कहा—'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा ।' तब नारदने कहा—॥ १ ॥ 'भगवन् ! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद जानता हूँ, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गारुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ। हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, परंतु भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये ।' तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है। ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति- शास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतादि कला और शिल्पविद्या—ये सब भी नाम ही हैं। तुम नामकी उपासना करो। वह जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है।' [ नारद---] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'नामसे भी अधिक है।' [नारद---] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें ।'२-५ द्वितीय खण्ड वाक्‌की ब्रह्मरूपमें उपासना वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास-पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु ), कीट-पतंग, पिपीलिका- पर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज्ञ और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्‌की उपासना करो। वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । .[नारद-] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद-] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥ १-२ ॥ तृतीय खण्ड मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं, उसी प्रकार वाक् और नामका मनमे अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा सङ्कल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी

खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७ कामना करता है । मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ] मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो । वह जो कि मनकी 'भगवन् ! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है ?' [ सनत्कुमार— ] 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक 'मनसे बढ़कर भी है ही ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मेरे प्रति मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥

चतुर्थ खण्ड संकल्पकी ब्रह्मरूपमें उपासना सङ्कल्प ही मनसे बढ़कर है । जिस समय पुरुष संकल्प लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोंके संकल्पके लिये लोक (फल) करता है, तभी वह मनस्यन करता है और फिर वाणीको समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सब समर्थ होते हैं। प्रेरित करता है । वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है, नाममें वह (ऐसा) यह संकल्प है, तुम संकल्पकी उपासना करो । सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता हो जाता है । वे ये (मन आदि) एकमात्र सङ्कल्परूप है [ विधाताके ] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, लयस्थानवाले, संकल्पमय और संकल्पमें ही प्रतिष्ठित हैं। प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले द्युलोक और पृथ्वीने मानो सकल्प किया है । वायु और लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है । आकाशने सकल्प किया है, जल और तेजने सकल्प किया। जहाँतक सङ्कल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो उनके संकल्पके लिये वृष्टि समर्थ होती है, [ अर्थात् उन जाती है, जो कि सङ्कल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना द्युलोकादिके सङ्कल्पसे वृष्टि होती है ] वृष्टिके संकल्यके लिये करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या सकल्पसे भी बढ़कर अन्न समर्थ होता है, अन्नके सङ्कल्पके लिये प्राण समर्थ होते हैं, कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।' प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ होते हैं, मन्त्रोंके सङ्कल्पके [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥

पञ्चम खण्ड चित्तकी ब्रह्मरूपमें चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है। जिस समय पुरुष चेतनावान् ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना होता है तभी वह संकल्प करता है, फिर मनन करता है, करो । वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वय ध्रुव है । नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रोंमें कर्म । वे ये होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वय प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा [ संकल्पादि ] एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय न पानेवाले लोकोंको स्वय व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं। इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य बहुज्ञ करता है। जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता।' और यदि कोई कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही।' अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥ चाहते हैं । अत चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त षष्ठ खण्ड ध्यानकी ब्रह्मरूपमें उपासना ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है । पृथ्वी मानो ध्यान करती देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं । अतः जो लोग है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, द्युलोक मानो ध्यान करता यहाँ मनुष्योंमें महत्त्व प्राप्त करते हैं वे मानो ध्यानके लाभका है, जल मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा ही अश पाते हैं; किंतु जो क्षुद्र होते हैं वे कलहप्रिय, चुगलखोर

४५८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

४५८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ और दूसरोंके मुँहपर ही उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं। तथा 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! जो सामर्थ्यवान् हैं वे भी ध्यानके लाभका ही अंश प्राप्त क्या ध्यानसे भी उत्कृष्ट कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'ध्यानसे करनेवाले हैं। अतः तुम ध्यानकी उपासना करो। वह जो कि भी उत्कृष्ट है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका ध्यानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, जहाँतक ध्यानकी उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि ध्यानकी

सप्तम खण्ड विज्ञानकी ब्रह्मरूपमें उपासना विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेद साधु, असाधु, मनोज्ञ, अमनोज्ञ, अन्न, रस तथा इहलोक और समझता है; तथा विज्ञानसे ही वह यजुर्वेद, सामवेद, चौथे परलोकको जानता है। तुम विज्ञानकी उपासना करो। वह जो आथर्वण वेद, वेदोंमे पाँचवें वेद इतिहास पुराण, व्याकरण, कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, विज्ञानवान् एव ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, विज्ञानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, गारुड और शिल्पविद्या, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, जो कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, कीट- [ नारद—] 'भगवन् ! क्या विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ है?' पतंग पिपीलिकापर्यन्त सम्पूर्ण जीव, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, [ सनत्कुमार—] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे वही बतलावें' ॥ १-२ ॥ अष्टम खण्ड बलकी ब्रह्मरूपमें उपासना बल ही विज्ञानकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। सौ विज्ञानवानों- बलसे ही द्युलोक, बलसे ही पर्वत, बलसे ही देवता और को भी एक बलवान् हिला देता है। जिस समय यह पुरुष मनुष्य, बलसे ही पशु, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद और बलवान् होता है तभी उठनेवाला भी होता है, उठकर कीट-पतंग एव पिपीलिकापर्यन्त समस्त प्राणी स्थित हैं तथा [ अर्थात् उठनेवाला होनेपर ] ही परिचर्या करनेवाला होता बलसे ही लोक स्थित है। तुम बलकी उपासना करो। है तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही उपसदन (समीप वह जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है गमन) करनेवाला होता है और उपसदन करनेपर ही दर्शन उसकी, जहाँतक बलकी गति है, स्वेच्छागति हो जाती है, करनेवाला होता है, श्रवण करनेवाला होता है, मनन करनेवाला जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता होता है, बोधवान् होता है, कर्ता होता है एव विज्ञाता है। [ नारद—] 'भगवन् ! क्या बलसे भी उत्कृष्ट कुछ होता है। बलसे ही पृथ्‍वी स्थित है, बलसे ही अन्तरिक्ष, है?' [सनत्कुमार—] 'बलसे उत्कृष्ट भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ १-२ ॥ नवम खण्ड अन्नकी ब्रह्मरूपमें उपासना अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है। इसीसे यदि दस दिन भोजन कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे न करे और जीवित भी रह जाय तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अन्नवान् और पानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक अमन्ता, अबोद्धा, अकर्ता और अविज्ञाता हो ही जाता है। अन्नकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, फिर अन्नकी प्राप्ति होनेपर ही वह द्रष्टा होता है, श्रोता होता जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। है, मनन करनेवाला होता है, बोद्धा होता है, कर्ता होता है [ नारद—] 'भगवन् ! क्या अन्नसे बढकर भी कुछ है?' और विज्ञाता होता है। तुम अन्नकी उपासना करो। वह जो [ सनत्कुमार—] 'अन्नसे बढकर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥

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सनत्कुमार-नारद-संवाद

मैत्रेयीको उपदेश

खण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४९ दशम खण्ड जलकी ब्रह्मरूपमें उपासना जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। इसीसे जब सुवृष्टि जल ही हैं। अतः तुम जलकी उपासना करो। वह जो कि नहीं होती तो प्राण [ इसलिये ] दुःखी हो जाते हैं कि अन्न जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, सम्पूर्ण थोड़ा होगा और जब सुवृष्टि होती है तो यह सोचकर कि कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और तृप्तिमान् होता है। खूब अन्न होगा, प्राण प्रसन्न हो जाते हैं। यह जो पृथ्वी है जहाँतक जलकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती मूर्तिमान् जल ही है तथा जो अन्तरिक्ष, जो द्युलोक, जो पर्वत, है, जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। जो देव-मनुष्य, जो पशु और पक्षी तथा जो तृण, वनस्पति, [ नारद-] 'भगवन् ! क्या जलसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' श्वापद और कीट-पतंग-पिपीलिकापर्यन्त प्राणी हैं वे भी मूर्तिमान् [ सनत्कुमार-] 'जलसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ एकादश खण्ड तेजकी ब्रह्मरूपमें उपासना तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है। अतः तेजकी उपासना करो। वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है उस समय लोग कहते हैं- 'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्धत हुआ प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो ऊर्ध्वगामी और तिर्यक्-गामी विद्युत्के सहित गड़गड़ाहटका कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] शब्द फैला देता है। इसीसे लोग कहते हैं- 'बिजली 'भगवन् ! क्या तेजसे भी बढकर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज 'तेजसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ द्वादश खण्ड आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना आकाश ही तेजसे बढकर है। आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र करो। वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं। आकाशके करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और द्वारा ही एक दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] पदा °]'उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [ सब 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढकर भी कुछ है ?' जीव एव अङ्कुरादि ] बढते हैं। तुम आकाशकी उपासना [सनत्कुमार-] 'आकाशसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ त्रयोदश खण्ड स्मरणकी ब्रह्मरूपमें उपासना स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढकर है। इसीसे यद्यपि न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं, उसी बहुत-से लोग [ एक स्थानपर ] बैठे हों तो भी स्मरण न समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको उ० सं० ५७-५८-

४५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

४५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७ पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको । तुम स्मरकी प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] 'भगवन् ! क्या स्मरसे उपासना करो । वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है, वहाँतक है ही ।' [ नारद-] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस करें' ॥ १-२॥ चतुर्दश खण्ड आशाकी ब्रह्मरूपसे उपासना आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं। जहाँतक आशाकी गति है, हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोक- 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] की कामना करता है । तुम आशाकी उपासना करो । 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [सनत्कुमार-] वह जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे करता है, उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । वह बतलावें' ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू नाभिमे अरे समर्पित रहते हैं, उसी प्रकार इस प्राणमे सारा निश्चय ही ब्रह्मघाती है। किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गये हैं, उन पिता आदि [के प्राणहीन शरीर] को यदि वह शूलसे गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पिताकी देता है । प्राण ही पिता है, प्राण माता है, प्राण भाई है, प्राण हत्या करनेवाला है' 'तू माताकी हत्या करनेवाला है' 'तू भ्राताकी बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है। हत्या करनेवाला है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो कुछ नहीं कहते। प्राण ही ये सब [पिता आदि] हैं। वह [उसके समीपवर्ती लोग] उससे कहते हैं- 'तुझे धिक्कार जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका इस प्रकार जाननेवाला है, अतिवादी होता है। उससे यदि वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी कोई कहे कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये, कि 'हाँ, अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥ १-४ ॥ षोडश खण्ड सत्य ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जो सत्य (परमार्थ सत्य आत्माके सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ।' [सनत्कुमार-] विज्ञान) के कारण अतिवदन करता है, वही निश्चय 'सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद-] अतिवदन करता है।' [नारद-] 'भगवन् ! मैं तो परमार्थ 'भगवन् ! मै विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ सप्तदश खण्ड विज्ञान ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' जानता है, तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता, [नारद-] 'भगवन् ! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जानना अपितु विशेषरूपसे जाननेवाला ही सत्यका कथन करता है। अतः चाहता हूँ' ॥ १ ॥

खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५१ अष्टादश खण्ड मति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है, ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] तभी वह विशेषरूपसे जानता है, विना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है। अतः मतिकी 'भगवन् ! मै मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ एकोनविंश खण्ड श्रद्धा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है, श्रद्धाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह 'मनन करता है, विना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करतां । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है। अतः 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ विंश खण्ड निष्ठा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है, विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह श्रद्धा करता है, विना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही, हूँ' ॥ १ ॥ एकविंश खण्ड कृति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है, उस ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] समय वह निष्ठा भी करने लगता है, विना किये किसीकी निष्ठा 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है। अतः कृतिकी हूँ' ॥ १ ॥ द्वाविंश खण्ड सुख ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मै सुखकी तभी वह करता है, विना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख मिलनेपर ही करता है, अतः सुखकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ त्रयोविंश खण्ड भूमा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार—] 'निश्चय जो भूमा है, वही सुख है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मैं भूमाकी अल्पमे दुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ चतुर्विंश खण्ड भूमा ही अमृत है [ सनत्कुमार— ] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है। और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७ और जो अल्प है, वह मर्त्य है।' [नारद--] 'भगवन् ! यह (भूमा) किसमे प्रतिष्ठित है?' [सनत्कुमार--] 'अपनी महिमामे, अथवा अपनी महिमामे भी नहीं है। इस लोकमे गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर इनका नाम भी महिमा है, किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है; क्योकि अन्य पदार्थ अन्यमे प्रतिष्ठित होता है। म तो यह कहता हूँ'-ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ १२ ॥ पञ्चविंश खण्ड भूमा ही सर्वत्र सब कुछ और आत्मा है वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर हे और वही यह सब है। अब उसीमे अहङ्कारादेश किया जाता है-मै ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मं ही पीछे हूँ, मे ही आगे हूँ, मे ही दायीं ओर हूँ, मै ही बायीं ओर हूँ और मै ही यह सब हूँ ॥ १ ॥ अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है। आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर हे और आत्मा ही यह सब है। वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता हे, वह स्वराट् हे, सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती हे। किंतु जो इससे विपरीत जानते हे वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और हे, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमे स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥ षड्विंश खण्ड आत्मदर्शनसे सबकी प्राप्ति, आहारशुद्धिसे क्रमशः अविद्याकी निवृत्ति उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वानके लिये आत्मासे प्राण, आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब हो जाता है ॥ १ ॥ इस विषयमें यह मन्त्र है-विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [आत्मरूप ही] देखता है, अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया हे तथा वही सौ, दश, एक, सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयो- पलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती हे; अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती हे तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं, उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया। उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥ ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ ७ ॥

अष्टम अध्याय

ॐ अष्टम अध्याय प्रथम खण्ड आत्मा ही सत्य है अब इस ब्रह्मपुरके भीतर और जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये। उस (गुरु) से यदि [शिष्यगण] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है, उसमें जो अन्तराकाश है, उसके भीतर क्या वस्तु है, जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये ?- तो [ इस प्रकार कहनेवाले शिष्योके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ १-२ ॥ जितना यह [भौतिक] आकाश है, उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु- ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा-ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एव इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है, वह सर्व सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥ उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है, उस समय क्या शेष रह जाता है ? । तो उसे कहना चाहिये 'इस (देह) की जरावस्थासे यह (आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें [ सम्पूर्ण ] कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, जिस प्रकार इस लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह जिस जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस देश या भूभागकी इच्छा करती है, उसी-उसीके आश्रित जीवन धारण करती है। जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता है, उसी प्रकार परलोकमे पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है। जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं, उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छागति नहीं होती। परन्तु जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओको जानकर [परलोकमे] जाते हैं, उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छागति होती है' ॥ ४-६ ॥ द्वितीय खण्ड आत्मज्ञानीकी सङ्कल्पसिद्धि वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हे [ अर्थात् उसके आत्मसम्बन्धी हो जाते हे, ] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है। और यदि वह मातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही माताएँ वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस मातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमा- को प्राप्त होता है। और यदि वह भ्रातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही भ्रातृगण वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस भ्रातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही वहनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस भगिनीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही सखा लोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उन सखाओंके लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाने हैं। उस गन्धमाल्यलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह अन्नपानसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित हो जाते हैं। उस अन्न-पान-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह गीतवाद्यसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही गीत-वाद्य वहाँ प्राप्त हो जाते हैं। उस गीतवाद्यलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह स्त्री लोककी कामना- वाला होता है तो उसके सकल्पमात्रसे ही स्त्रियां उसके पास उपस्थित हो जाती हैं। उस स्त्री-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमान्वित होता है। वह जिस-जिस प्रदेशकी कामना करने- वाला होता है और जिस-जिस भोगकी इच्छा करता है वह सब उसके सकल्पसे ही उसको प्राप्त हो जाता है। उससे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ १-१० ॥

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८ तृतीय खण्ड ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमे ही है वे ये सत्यकाम अनृतके आच्छादनसे युक्त हैं। सत्य होनेपर वह यह आत्मा हृदयमें है। 'हृदि अयम्' (यह हृदयमें भी अनृत उनका अधिधान (आच्छादन करनेवाला) है, है) यही इसका निरुक्त (व्युत्पत्ति) है। इसीसे यह क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता 'हृदय' है। इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोक- है, वह वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता। तथा इस को जाता है ॥ ३ ॥ लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे उत्थान कर परम को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह प्राप्त नहीं करता, उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित आत्मा है, यही अमृत एव अभय है ओर यही ब्रह्म है- ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ इसके ये ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥ सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं। इस विषयमें यह वे ये 'सकार' 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं। दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमे गड़े हुए सुवर्णके खजानेको उनमे जो 'सकार' है, वह अमृत है, जो 'तकार' हे, वह उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी मर्त्य हे और जो 'यम्' है, उससे वह दोनोंका नियमन करता नहीं जानते, इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको है, क्योकि इससे वह उन दोनोका नियमन करता है; इसलिये जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता गयी है ॥ १-२ ॥ है ॥ ५ ॥ चतुर्थ खण्ड आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति जो आत्मा है, वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है, असघर्ष) के लिये इन्हें विक्षेगरूपसे धारण करनेवाला सेतु इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा हो स क्ते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि [शास्त्र एव आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं, उन्हीं- यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता हे तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी यथेच्छगति हो जाती है ॥ १-३ ॥ पञ्चम खण्ड ब्रह्मचर्यकी महिमा अब [लोकमें] जिसे 'यज्ञ' (परम पुरुषार्थका साधन) भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके जानकर पुरुष मनन करता है। तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट द्वारा ही उस (ब्रह्मलोक) को प्राप्त होता है। और जिसे न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है। तथा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरण्ययन ऐसा कहा जाता है जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्-परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरमदीय सरोवर है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय

खण्ड ७ ] ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५५ मण्डप है। उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' की प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोक- जाती है ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड हृदयगत नाड़ियाँ ही उत्क्रमणका मार्ग हैं अब ये जो हृदयकी नाड़ियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं, क्योंकि यह हैं- 'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ?' आदित्य पिंगलवर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता, तबतक उन्हें और यह लोहितवर्ण है। इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस जानता है। फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस है, उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह (दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है, उसी प्रकार ये सूर्यकी 'ॐ' ऐसा [कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ] ऊर्ध्वलोक किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है, प्रविष्ट हैं। वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] नाड़ियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाड़ियोंसे निकली हैं वे इस निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका आदित्यमें व्याप्त हैं। ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है। इस विषयमें यह हुआ-भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न मन्त्र है-'हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमेंसे एक होकर स्वप्न नहीं देखता, उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है, शेष इधर-उधर व्याप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ जानेवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमण- अब जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता का कारण होती हैं [उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती] ॥४-६॥ सप्तम खण्ड इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, इच्छासे रहे हो ?" उन्होंने कहा-'जो आत्मा पापरहित, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, [इन जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम आठ स्वरूपभूत गुणोंसे युक्त है] उसे खोजना चाहिये और और सत्यसङ्कल्प है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माका आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता अन्वेषणकर उसे विशेषरूपसे जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोक है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्‌के है-ऐसा प्रजापतिने कहा। प्रजापतिके इस वाक्यको देवता वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं। उसी आत्माको जाननेकी इच्छा और असुर दोनोंने ही परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे- करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ १-३ ॥ 'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसे जाननेपर जीव उनसे प्रजापतिने कहा-'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'-ऐसा देता है, आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म निश्चयकर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा है।' [ तब उन्होंने पूछा-] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब विरोचन-ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है, उनमें लेकर प्रजापतिके पास आये। उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्य- आत्मा कौन-सा है ?" इसपर प्रजापतिने कहा-'मैंने जिस वास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा-'तुम यहाँ किस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है, वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥

४५६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ८ अष्टम खण्ड विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना 'जलपूर्ण शकोरेमें अपनेको देखकर तुम आत्माके विषयमें जो न जान सको वह मुझे बतलाओ' ऐसा [प्रजापतिने कहा।] उन्होंने जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने कहा- 'तुम क्या देखते हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! हम अपने इस समस्त आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं।' उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलङ्कृत होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखो।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलङ्कृत हो, सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' उन दोनोंने कहा-भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं, उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं।' तब प्रजापतिने कहा- 'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ॥ १-३ ॥ प्रजापतिने उन्हें [ दूर गया] देखकर कहा-'ये दोनों आत्माको उपलब्ध किये बिना - उसका साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं, देवता हों या असुर-जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे, उन्हींका पराभव होगा।' वह जो विरोचन था, शान्तचित्तसे असुरोंके पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी- 'इस लोकमें यह आत्मा (शरीर) ही पूजनीय है और शरीर ही सेवनीय है। शरीरकी ही पूजा और परिचर्या करनेवाला पुरुष इस लोक और परलोक दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है।' इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और यजन न करनेवाला पुरुष होता है, उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं। यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको भिक्षा [गन्ध पुष्प-अन्नादि], वस्त्र और अलङ्कारोंसे सुसज्जित करते हैं और उनके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे- ऐसा मानते हैं।४-५। नवम खण्ड इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन ओर प्रश्न किन्तु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलङ्कृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है। 'इस [छायात्मदर्शन] मे मैं कोई भोग्य नहीं देखता।' इसलिये इन्द्र समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा- 'इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे,अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा-'भगवन् ! जिस प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलङ्कृत होनेपर अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो जाता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा, स्राम होनेपर स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई फल दिखायी नहीं देता' ॥ १-२ ॥ 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है,' ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और [ ब्रह्मचर्यसे] निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥ दशम खण्ड स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन 'जो यह स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है, यह आत्मा है' ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है।' ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले -गये। किन्तु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध होता है, और यदि यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम होता है। इस प्रकार यह इसके दोषसे दूषित नहीं होता। यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७ और न इसकी रुग्णतासे रुग्ण होता है । किन्तु इसे मानो कोई मारता हो, कोई ताडित करता हो, यह मानो अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—ऐसा हो जाता है, अतः इसमें ( इस प्रकारके आत्मदर्शनमें ) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥१-२॥ [ अतः ] वे समित्पाणि होकर फिर [ प्रजापतिके पास ] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह ( स्वप्नशरीर ) अनन्ध रहता है और यह रुग्ण होता है तो भी वह नीरोग रहता है, इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता । न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी रुग्णतासे वह रुग्ण होता है, किन्तु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [ उसके कारण ] मानो वह अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—[ ऐसा अनुभव होनेके कारण ] इसमे मै कोई फल नहीं देखता ।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया, तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ३-४ ॥ एकादश खण्ड इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए 'जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता, वह आत्मा है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।' यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये, किन्तु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—"उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ' ओर न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता" वे समित्पाणि होकर पुन. प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुन- आगमन हुआ है ।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्थामें तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मे हूँ' और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह मानो विनाश- को प्राप्त हो जाता है । इसमे मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता ।' 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुन व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न नहीं है । अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहाँ निवास किया । ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये । इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास [ करके अधिकार प्राप्त ] किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ १-३ ॥ द्वादश खण्ड इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश 'इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है, यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है। सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होने- पर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते । वायु अशरीर है, अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि—ये सब अशरीर हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे उत्पन्न होकर सूर्यकी परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते है, उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है । उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता है और अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमे जुता रहता है, उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ १-३ ॥ जिसमे यह चक्षुद्भाग उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप ग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ, वह आत्मा है, उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ, वही आत्मा है, उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है। जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ,

५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८

५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८

वह भी आत्मा है, उसके श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है । और करता है । इस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं । इसीसे जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ, वह आत्मा है। मन उसका उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्मा- दिव्य नेत्र है, वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको को जान और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात् देखता हुआ रमण करता है ॥ ४-५ ॥ रूपसे अनुभव करता है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें यह देखता हुआ रमण प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥

त्रयोदश खण्ड श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश मैं श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मको प्राप्त होऊँ तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ । अश्व जिस प्रकार रोएँ त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥

चतुर्दश खण्ड आकाश नामक ब्रह्मका उपदेश आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह के यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यश स्वरूप आत्मा) करनेवाला है । वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं, को प्राप्त होना चाहता हूँ । वह मैं यशोंका यश हूँ, मैं बिना वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापतिके दाँतोंके भक्षण करनेवाले लोहितवर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त सभागृहको प्राप्त होता हूँ, मैं यश संज्ञक आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मणों- न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥

पञ्चदश खण्ड आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल इस पूर्वोक्त आत्मज्ञानका ब्रह्माने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, धार्मिक बनाकर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता गुरुके कर्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन करके हुआ और आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार वर्तता हुआ आचार्यकुलसे लौटकर गृहस्थाश्रममें स्थित होता है, फिर [ अन्तमें ] वह निश्चय ही ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एव शिष्यादिको ] फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥

॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥ ॥ सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है ।