भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 832 में से

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पृष्ठ 488

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८ तृतीय खण्ड ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमे ही है वे ये सत्यकाम अनृतके आच्छादनसे युक्त हैं। सत्य होनेपर वह यह आत्मा हृदयमें है। 'हृदि अयम्' (यह हृदयमें भी अनृत उनका अधिधान (आच्छादन करनेवाला) है, है) यही इसका निरुक्त (व्युत्पत्ति) है। इसीसे यह क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता 'हृदय' है। इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोक- है, वह वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता। तथा इस को जाता है ॥ ३ ॥ लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे उत्थान कर परम को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह प्राप्त नहीं करता, उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित आत्मा है, यही अमृत एव अभय है ओर यही ब्रह्म है- ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ इसके ये ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥ सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं। इस विषयमें यह वे ये 'सकार' 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं। दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमे गड़े हुए सुवर्णके खजानेको उनमे जो 'सकार' है, वह अमृत है, जो 'तकार' हे, वह उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी मर्त्य हे और जो 'यम्' है, उससे वह दोनोंका नियमन करता नहीं जानते, इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको है, क्योकि इससे वह उन दोनोका नियमन करता है; इसलिये जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता गयी है ॥ १-२ ॥ है ॥ ५ ॥ चतुर्थ खण्ड आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति जो आत्मा है, वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है, असघर्ष) के लिये इन्हें विक्षेगरूपसे धारण करनेवाला सेतु इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा हो स क्ते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि [शास्त्र एव आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं, उन्हीं- यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता हे तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी यथेच्छगति हो जाती है ॥ १-३ ॥ पञ्चम खण्ड ब्रह्मचर्यकी महिमा अब [लोकमें] जिसे 'यज्ञ' (परम पुरुषार्थका साधन) भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके जानकर पुरुष मनन करता है। तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट द्वारा ही उस (ब्रह्मलोक) को प्राप्त होता है। और जिसे न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है। तथा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरण्ययन ऐसा कहा जाता है जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्-परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरमदीय सरोवर है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय