कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ७ ] ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५५ मण्डप है। उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' की प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोक- जाती है ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड हृदयगत नाड़ियाँ ही उत्क्रमणका मार्ग हैं अब ये जो हृदयकी नाड़ियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं, क्योंकि यह हैं- 'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ?' आदित्य पिंगलवर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता, तबतक उन्हें और यह लोहितवर्ण है। इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस जानता है। फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस है, उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह (दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है, उसी प्रकार ये सूर्यकी 'ॐ' ऐसा [कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ] ऊर्ध्वलोक किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है, प्रविष्ट हैं। वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] नाड़ियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाड़ियोंसे निकली हैं वे इस निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका आदित्यमें व्याप्त हैं। ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है। इस विषयमें यह हुआ-भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न मन्त्र है-'हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमेंसे एक होकर स्वप्न नहीं देखता, उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है, शेष इधर-उधर व्याप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ जानेवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमण- अब जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता का कारण होती हैं [उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती] ॥४-६॥ सप्तम खण्ड इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, इच्छासे रहे हो ?" उन्होंने कहा-'जो आत्मा पापरहित, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, [इन जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम आठ स्वरूपभूत गुणोंसे युक्त है] उसे खोजना चाहिये और और सत्यसङ्कल्प है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माका आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता अन्वेषणकर उसे विशेषरूपसे जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोक है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्के है-ऐसा प्रजापतिने कहा। प्रजापतिके इस वाक्यको देवता वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं। उसी आत्माको जाननेकी इच्छा और असुर दोनोंने ही परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे- करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ १-३ ॥ 'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसे जाननेपर जीव उनसे प्रजापतिने कहा-'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'-ऐसा देता है, आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म निश्चयकर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा है।' [ तब उन्होंने पूछा-] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब विरोचन-ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है, उनमें लेकर प्रजापतिके पास आये। उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्य- आत्मा कौन-सा है ?" इसपर प्रजापतिने कहा-'मैंने जिस वास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा-'तुम यहाँ किस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है, वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥