भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 832 में से

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पृष्ठ 490

४५६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ८ अष्टम खण्ड विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना 'जलपूर्ण शकोरेमें अपनेको देखकर तुम आत्माके विषयमें जो न जान सको वह मुझे बतलाओ' ऐसा [प्रजापतिने कहा।] उन्होंने जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने कहा- 'तुम क्या देखते हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! हम अपने इस समस्त आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं।' उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलङ्कृत होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखो।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलङ्कृत हो, सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' उन दोनोंने कहा-भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं, उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं।' तब प्रजापतिने कहा- 'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ॥ १-३ ॥ प्रजापतिने उन्हें [ दूर गया] देखकर कहा-'ये दोनों आत्माको उपलब्ध किये बिना - उसका साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं, देवता हों या असुर-जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे, उन्हींका पराभव होगा।' वह जो विरोचन था, शान्तचित्तसे असुरोंके पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी- 'इस लोकमें यह आत्मा (शरीर) ही पूजनीय है और शरीर ही सेवनीय है। शरीरकी ही पूजा और परिचर्या करनेवाला पुरुष इस लोक और परलोक दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है।' इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और यजन न करनेवाला पुरुष होता है, उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं। यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको भिक्षा [गन्ध पुष्प-अन्नादि], वस्त्र और अलङ्कारोंसे सुसज्जित करते हैं और उनके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे- ऐसा मानते हैं।४-५। नवम खण्ड इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन ओर प्रश्न किन्तु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलङ्कृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है। 'इस [छायात्मदर्शन] मे मैं कोई भोग्य नहीं देखता।' इसलिये इन्द्र समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा- 'इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे,अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा-'भगवन् ! जिस प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलङ्कृत होनेपर अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो जाता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा, स्राम होनेपर स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई फल दिखायी नहीं देता' ॥ १-२ ॥ 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है,' ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और [ ब्रह्मचर्यसे] निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥ दशम खण्ड स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन 'जो यह स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है, यह आत्मा है' ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है।' ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले -गये। किन्तु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध होता है, और यदि यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम होता है। इस प्रकार यह इसके दोषसे दूषित नहीं होता। यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता