भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 832 में से

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पृष्ठ 491

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७ और न इसकी रुग्णतासे रुग्ण होता है । किन्तु इसे मानो कोई मारता हो, कोई ताडित करता हो, यह मानो अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—ऐसा हो जाता है, अतः इसमें ( इस प्रकारके आत्मदर्शनमें ) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥१-२॥ [ अतः ] वे समित्पाणि होकर फिर [ प्रजापतिके पास ] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह ( स्वप्नशरीर ) अनन्ध रहता है और यह रुग्ण होता है तो भी वह नीरोग रहता है, इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता । न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी रुग्णतासे वह रुग्ण होता है, किन्तु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [ उसके कारण ] मानो वह अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—[ ऐसा अनुभव होनेके कारण ] इसमे मै कोई फल नहीं देखता ।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया, तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ३-४ ॥ एकादश खण्ड इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए 'जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता, वह आत्मा है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।' यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये, किन्तु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—"उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ' ओर न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता" वे समित्पाणि होकर पुन. प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुन- आगमन हुआ है ।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्थामें तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मे हूँ' और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह मानो विनाश- को प्राप्त हो जाता है । इसमे मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता ।' 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुन व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न नहीं है । अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहाँ निवास किया । ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये । इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास [ करके अधिकार प्राप्त ] किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ १-३ ॥ द्वादश खण्ड इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश 'इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है, यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है। सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होने- पर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते । वायु अशरीर है, अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि—ये सब अशरीर हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे उत्पन्न होकर सूर्यकी परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते है, उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है । उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता है और अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमे जुता रहता है, उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ १-३ ॥ जिसमे यह चक्षुद्भाग उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप ग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ, वह आत्मा है, उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ, वही आत्मा है, उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है। जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ,