कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८
वह भी आत्मा है, उसके श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है । और करता है । इस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं । इसीसे जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ, वह आत्मा है। मन उसका उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्मा- दिव्य नेत्र है, वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको को जान और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात् देखता हुआ रमण करता है ॥ ४-५ ॥ रूपसे अनुभव करता है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें यह देखता हुआ रमण प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥
त्रयोदश खण्ड श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश मैं श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मको प्राप्त होऊँ तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ । अश्व जिस प्रकार रोएँ त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥
चतुर्दश खण्ड आकाश नामक ब्रह्मका उपदेश आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह के यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यश स्वरूप आत्मा) करनेवाला है । वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं, को प्राप्त होना चाहता हूँ । वह मैं यशोंका यश हूँ, मैं बिना वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापतिके दाँतोंके भक्षण करनेवाले लोहितवर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त सभागृहको प्राप्त होता हूँ, मैं यश संज्ञक आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मणों- न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥
पञ्चदश खण्ड आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल इस पूर्वोक्त आत्मज्ञानका ब्रह्माने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, धार्मिक बनाकर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता गुरुके कर्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन करके हुआ और आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार वर्तता हुआ आचार्यकुलसे लौटकर गृहस्थाश्रममें स्थित होता है, फिर [ अन्तमें ] वह निश्चय ही ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एव शिष्यादिको ] फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥
॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥ ॥ सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है ।