कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ बृहदारण्यकोपनिषद् बृहदारण्यक उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेयि ब्राह्मणके अन्तर्गत है। आकारमें यह सबसे बृहत् (बड़ी) है एव अरण्य (वनमे) अध्ययन की जानेसे इसे आरण्यक कहा जाता है। इस प्रकार 'बृहत्' और 'आरण्यक' होनेके कारण इसका 'बृहदारण्यक' नाम हो गया। शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है। प्रथम अध्याय प्रथम ब्राह्मण यज्ञकी अश्वके रूपमें कल्पना ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका सिर है, सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर'अग्नि खुला हुआ मुख है चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो और संवत्सर यज्ञिय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और हिनहिनाना ही उसकी है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ वाणी है ॥ १ ॥ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ, उसकी मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि पूर्वसमुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाश- उसकी अपर (पश्चिम—) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस स्थित मेघ) मांस हैं, वात ऊवध्य (उदरस्थित अर्धजीर्ण अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह हुए। इसने हय होकर अन्न) है, नदियाँ गुदा-नाड़ियाँ हैं, पर्वत यकृत् और देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको हृद्गत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ रोम हैं, उदय और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका होता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और अस्त होता हुआ बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥ द्वितीय ब्राह्मण प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे-प्रलयसे हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप (सूक्ष्म जल) ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त है; अतः यही अर्कको अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस होऊँ' ऐसा मन-संकल्प किया। उसने अर्चन (पूजन) करते अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥ १ 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिनके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उनका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।