कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४९ दशम खण्ड जलकी ब्रह्मरूपमें उपासना जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। इसीसे जब सुवृष्टि जल ही हैं। अतः तुम जलकी उपासना करो। वह जो कि नहीं होती तो प्राण [ इसलिये ] दुःखी हो जाते हैं कि अन्न जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, सम्पूर्ण थोड़ा होगा और जब सुवृष्टि होती है तो यह सोचकर कि कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और तृप्तिमान् होता है। खूब अन्न होगा, प्राण प्रसन्न हो जाते हैं। यह जो पृथ्वी है जहाँतक जलकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती मूर्तिमान् जल ही है तथा जो अन्तरिक्ष, जो द्युलोक, जो पर्वत, है, जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। जो देव-मनुष्य, जो पशु और पक्षी तथा जो तृण, वनस्पति, [ नारद-] 'भगवन् ! क्या जलसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' श्वापद और कीट-पतंग-पिपीलिकापर्यन्त प्राणी हैं वे भी मूर्तिमान् [ सनत्कुमार-] 'जलसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ एकादश खण्ड तेजकी ब्रह्मरूपमें उपासना तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है। अतः तेजकी उपासना करो। वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है उस समय लोग कहते हैं- 'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्धत हुआ प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो ऊर्ध्वगामी और तिर्यक्-गामी विद्युत्के सहित गड़गड़ाहटका कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] शब्द फैला देता है। इसीसे लोग कहते हैं- 'बिजली 'भगवन् ! क्या तेजसे भी बढकर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज 'तेजसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ द्वादश खण्ड आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना आकाश ही तेजसे बढकर है। आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र करो। वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं। आकाशके करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और द्वारा ही एक दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] पदा °]'उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [ सब 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढकर भी कुछ है ?' जीव एव अङ्कुरादि ] बढते हैं। तुम आकाशकी उपासना [सनत्कुमार-] 'आकाशसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ त्रयोदश खण्ड स्मरणकी ब्रह्मरूपमें उपासना स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढकर है। इसीसे यद्यपि न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं, उसी बहुत-से लोग [ एक स्थानपर ] बैठे हों तो भी स्मरण न समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको उ० सं० ५७-५८-