कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७ पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको । तुम स्मरकी प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] 'भगवन् ! क्या स्मरसे उपासना करो । वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है, वहाँतक है ही ।' [ नारद-] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस करें' ॥ १-२॥ चतुर्दश खण्ड आशाकी ब्रह्मरूपसे उपासना आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं। जहाँतक आशाकी गति है, हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोक- 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] की कामना करता है । तुम आशाकी उपासना करो । 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [सनत्कुमार-] वह जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे करता है, उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । वह बतलावें' ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू नाभिमे अरे समर्पित रहते हैं, उसी प्रकार इस प्राणमे सारा निश्चय ही ब्रह्मघाती है। किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गये हैं, उन पिता आदि [के प्राणहीन शरीर] को यदि वह शूलसे गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पिताकी देता है । प्राण ही पिता है, प्राण माता है, प्राण भाई है, प्राण हत्या करनेवाला है' 'तू माताकी हत्या करनेवाला है' 'तू भ्राताकी बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है। हत्या करनेवाला है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो कुछ नहीं कहते। प्राण ही ये सब [पिता आदि] हैं। वह [उसके समीपवर्ती लोग] उससे कहते हैं- 'तुझे धिक्कार जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका इस प्रकार जाननेवाला है, अतिवादी होता है। उससे यदि वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी कोई कहे कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये, कि 'हाँ, अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥ १-४ ॥ षोडश खण्ड सत्य ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जो सत्य (परमार्थ सत्य आत्माके सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ।' [सनत्कुमार-] विज्ञान) के कारण अतिवदन करता है, वही निश्चय 'सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद-] अतिवदन करता है।' [नारद-] 'भगवन् ! मैं तो परमार्थ 'भगवन् ! मै विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ सप्तदश खण्ड विज्ञान ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' जानता है, तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता, [नारद-] 'भगवन् ! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जानना अपितु विशेषरूपसे जाननेवाला ही सत्यका कथन करता है। अतः चाहता हूँ' ॥ १ ॥