भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 832 में से

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पृष्ठ 485

खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५१ अष्टादश खण्ड मति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है, ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] तभी वह विशेषरूपसे जानता है, विना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है। अतः मतिकी 'भगवन् ! मै मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ एकोनविंश खण्ड श्रद्धा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है, श्रद्धाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह 'मनन करता है, विना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करतां । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है। अतः 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ विंश खण्ड निष्ठा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है, विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह श्रद्धा करता है, विना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही, हूँ' ॥ १ ॥ एकविंश खण्ड कृति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है, उस ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] समय वह निष्ठा भी करने लगता है, विना किये किसीकी निष्ठा 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है। अतः कृतिकी हूँ' ॥ १ ॥ द्वाविंश खण्ड सुख ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मै सुखकी तभी वह करता है, विना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख मिलनेपर ही करता है, अतः सुखकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ त्रयोविंश खण्ड भूमा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार—] 'निश्चय जो भूमा है, वही सुख है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मैं भूमाकी अल्पमे दुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ चतुर्विंश खण्ड भूमा ही अमृत है [ सनत्कुमार— ] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है। और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है