भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 832 में से

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पृष्ठ 477

खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४५ एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ ००९०० षोडश खण्ड मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है। वह जिस (चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रकार उस [ परीक्षाके ] समय नहीं जलता [ उसी प्रकार प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको विद्वान्का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है ]। मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है, किंतु यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है। और यदि वह श्वेतकेतो ! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको गया—उसे जान गया ॥ १-३ ॥

॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥