भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 478

ॐ सप्तम अध्याय प्रथम खण्ड नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना 'भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये' ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये । उनसे सनत्कुमारजीने कहा—'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा ।' तब नारदने कहा—॥ १ ॥ 'भगवन् ! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद जानता हूँ, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गारुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ। हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, परंतु भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये ।' तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है। ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति- शास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतादि कला और शिल्पविद्या—ये सब भी नाम ही हैं। तुम नामकी उपासना करो। वह जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है।' [ नारद---] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'नामसे भी अधिक है।' [नारद---] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें ।'२-५ द्वितीय खण्ड वाक्‌की ब्रह्मरूपमें उपासना वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास-पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु ), कीट-पतंग, पिपीलिका- पर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज्ञ और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्‌की उपासना करो। वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । .[नारद-] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद-] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥ १-२ ॥ तृतीय खण्ड मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं, उसी प्रकार वाक् और नामका मनमे अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा सङ्कल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी