कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७ कामना करता है । मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ] मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो । वह जो कि मनकी 'भगवन् ! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है ?' [ सनत्कुमार— ] 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक 'मनसे बढ़कर भी है ही ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मेरे प्रति मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥
चतुर्थ खण्ड संकल्पकी ब्रह्मरूपमें उपासना सङ्कल्प ही मनसे बढ़कर है । जिस समय पुरुष संकल्प लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोंके संकल्पके लिये लोक (फल) करता है, तभी वह मनस्यन करता है और फिर वाणीको समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सब समर्थ होते हैं। प्रेरित करता है । वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है, नाममें वह (ऐसा) यह संकल्प है, तुम संकल्पकी उपासना करो । सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता हो जाता है । वे ये (मन आदि) एकमात्र सङ्कल्परूप है [ विधाताके ] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, लयस्थानवाले, संकल्पमय और संकल्पमें ही प्रतिष्ठित हैं। प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले द्युलोक और पृथ्वीने मानो सकल्प किया है । वायु और लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है । आकाशने सकल्प किया है, जल और तेजने सकल्प किया। जहाँतक सङ्कल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो उनके संकल्पके लिये वृष्टि समर्थ होती है, [ अर्थात् उन जाती है, जो कि सङ्कल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना द्युलोकादिके सङ्कल्पसे वृष्टि होती है ] वृष्टिके संकल्यके लिये करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या सकल्पसे भी बढ़कर अन्न समर्थ होता है, अन्नके सङ्कल्पके लिये प्राण समर्थ होते हैं, कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।' प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ होते हैं, मन्त्रोंके सङ्कल्पके [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥
पञ्चम खण्ड चित्तकी ब्रह्मरूपमें चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है। जिस समय पुरुष चेतनावान् ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना होता है तभी वह संकल्प करता है, फिर मनन करता है, करो । वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वय ध्रुव है । नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रोंमें कर्म । वे ये होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वय प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा [ संकल्पादि ] एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय न पानेवाले लोकोंको स्वय व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं। इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य बहुज्ञ करता है। जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता।' और यदि कोई कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही।' अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-३ ॥ चाहते हैं । अत चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त षष्ठ खण्ड ध्यानकी ब्रह्मरूपमें उपासना ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है । पृथ्वी मानो ध्यान करती देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं । अतः जो लोग है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, द्युलोक मानो ध्यान करता यहाँ मनुष्योंमें महत्त्व प्राप्त करते हैं वे मानो ध्यानके लाभका है, जल मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा ही अश पाते हैं; किंतु जो क्षुद्र होते हैं वे कलहप्रिय, चुगलखोर