भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 832 में से

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पृष्ठ 480

४५८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ और दूसरोंके मुँहपर ही उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं। तथा 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! जो सामर्थ्यवान् हैं वे भी ध्यानके लाभका ही अंश प्राप्त क्या ध्यानसे भी उत्कृष्ट कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'ध्यानसे करनेवाले हैं। अतः तुम ध्यानकी उपासना करो। वह जो कि भी उत्कृष्ट है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका ध्यानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, जहाँतक ध्यानकी उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि ध्यानकी

सप्तम खण्ड विज्ञानकी ब्रह्मरूपमें उपासना विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेद साधु, असाधु, मनोज्ञ, अमनोज्ञ, अन्न, रस तथा इहलोक और समझता है; तथा विज्ञानसे ही वह यजुर्वेद, सामवेद, चौथे परलोकको जानता है। तुम विज्ञानकी उपासना करो। वह जो आथर्वण वेद, वेदोंमे पाँचवें वेद इतिहास पुराण, व्याकरण, कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, विज्ञानवान् एव ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, विज्ञानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, गारुड और शिल्पविद्या, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, जो कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, कीट- [ नारद—] 'भगवन् ! क्या विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ है?' पतंग पिपीलिकापर्यन्त सम्पूर्ण जीव, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, [ सनत्कुमार—] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे वही बतलावें' ॥ १-२ ॥ अष्टम खण्ड बलकी ब्रह्मरूपमें उपासना बल ही विज्ञानकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। सौ विज्ञानवानों- बलसे ही द्युलोक, बलसे ही पर्वत, बलसे ही देवता और को भी एक बलवान् हिला देता है। जिस समय यह पुरुष मनुष्य, बलसे ही पशु, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद और बलवान् होता है तभी उठनेवाला भी होता है, उठकर कीट-पतंग एव पिपीलिकापर्यन्त समस्त प्राणी स्थित हैं तथा [ अर्थात् उठनेवाला होनेपर ] ही परिचर्या करनेवाला होता बलसे ही लोक स्थित है। तुम बलकी उपासना करो। है तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही उपसदन (समीप वह जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है गमन) करनेवाला होता है और उपसदन करनेपर ही दर्शन उसकी, जहाँतक बलकी गति है, स्वेच्छागति हो जाती है, करनेवाला होता है, श्रवण करनेवाला होता है, मनन करनेवाला जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता होता है, बोधवान् होता है, कर्ता होता है एव विज्ञाता है। [ नारद—] 'भगवन् ! क्या बलसे भी उत्कृष्ट कुछ होता है। बलसे ही पृथ्‍वी स्थित है, बलसे ही अन्तरिक्ष, है?' [सनत्कुमार—] 'बलसे उत्कृष्ट भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ १-२ ॥ नवम खण्ड अन्नकी ब्रह्मरूपमें उपासना अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है। इसीसे यदि दस दिन भोजन कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे न करे और जीवित भी रह जाय तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अन्नवान् और पानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक अमन्ता, अबोद्धा, अकर्ता और अविज्ञाता हो ही जाता है। अन्नकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, फिर अन्नकी प्राप्ति होनेपर ही वह द्रष्टा होता है, श्रोता होता जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। है, मनन करनेवाला होता है, बोद्धा होता है, कर्ता होता है [ नारद—] 'भगवन् ! क्या अन्नसे बढकर भी कुछ है?' और विज्ञाता होता है। तुम अन्नकी उपासना करो। वह जो [ सनत्कुमार—] 'अन्नसे बढकर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥