कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६१ उद्गान किया । घ्राणमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ गन्ध सूँघता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब चक्षुने "तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । चक्षुमे जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अनुचित (निषिद्ध पदार्थोंको) देखता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब श्रोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । श्रोत्रमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित ( ईश्वरनिन्दा, परनिन्दा, आत्म प्रशंसा आदि) श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। फिर उन्होंने मनसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो ।' तब मनने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । मनमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ सङ्कल्प करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित (काम-क्रोध लोभ-वैर- हिंसा आदिके) सङ्कल्प करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका ससर्ग हुआ और ऐसे ही [ असुरोंने ] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ २-६॥ फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, 'तुम हमा लिये उद्गान करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा। किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये । तब देवगण [ विजेता होकर ] प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ । जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य (सौतेले भाई) का पराभव होता है ॥ ७ ॥ वे बोले, 'जिसने हमें इस प्रकार देवभावको प्राप्त करवाया हे, वह कहाँ है ?' [उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि] 'यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका सार-रस है।' इस पूर्वोक्त देवताका 'दूर' नाम है, क्योकि इससे मृत्यु दूर है । जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ॥ ८-९ ॥ उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको हटाकर जहाँ इन दिशाओंका अन्त है वहाँ पहुँचा दिया । वहाँ इनके पापको उसने तिरस्कारपूर्वक स्थापित कर दिया । अतः 'मैं पापरूप मृत्युसे संश्लिष्ट न हो जाऊँ' इस भयसे अन्त्यजनोंके पास न जाय और अन्त दिशामें भी न जाय । उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्म- भावको प्राप्त ] कर दिया । उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया। वह वाक् जिस समय मृत्युसे पार हुई, यह अग्नि हो गयी। वह यह अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है। फिर प्राणका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह वायु हो गया। वह यह अतिक्रान्त वायु मृत्युने परे बहता है। फिर चक्षुका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह आदित्य हो गया । वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है। फिर श्रोत्रका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह दिशा हो गया । वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं। फिर मनका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह चन्द्रमा हो गया। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। इसी प्रकार यह देवता उसका मृत्युसे अतिवहन करती है -जो कि इसे इस प्रकार जानता है। फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यरूपी खाद्यका आवाहन किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १०-१७ ॥ वे देवगण बोले, 'यह जो अन्न है, वह सब तो इतना ही है, उसे तुमने अपने लिये आवाहन कर लिया है। अतः