भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 832 में से

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पृष्ठ 497

ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६३ चतुर्थ ब्राह्मण ब्रह्मकी सर्वरूपता और चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि' ऐसा कहा, इसलिये उसका 'अहम्' नाम हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्' ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम होता है वह बतलाता है। क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [आत्मसञ्ज्ञक प्रजापति] ने समस्त पापोंको उपन-दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है, वह उसे दग्ध कर देता है, जोउससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥ वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता हूँ १' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है। वह [ अकेला ] रमण नहीं करता था। इसी कारण अब भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की। जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं, वैसा ही उसका परिमाण हो गया। उसने इस अपनी देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [ पुरुषार्द्ध ] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ, उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं। उस (शतरूपा) ने यह विचार किया कि 'अपनेसे ही उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ' अतः वह गौ हो गयी, तब दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए। तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया। फिर वह गर्दमी हो गयी और मनु गर्दभ हो गया और उससे समागम करने लगा। इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया। फिर वह भेड़ हो गयी और मनु मेढ़ा होकर उससे समागम करने लगा। इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुषरूप जोड़े) हैं, उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ २-४ ॥ १ मैं हूँ। २ यह मैं हूँ। उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सृष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की सृष्टिमें [ स्रष्टा ] होता है। फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूप योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे रोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे रोमरहित ही होती है। अत [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस (अग्नि) का यजन करो, इस (इन्द्र) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह द्रवरूप है, उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अति- सृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की— स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अति- सृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ५-६ ॥ यह पूर्वोक्त जगत् उस समय (उत्पत्तिसे पूर्व) अव्याकृत था। वह नाम-रूपके योगसे व्यक्त हुआ, अर्थात् 'यह इस नाम और इस रूपवाला है' इस प्रकार व्यक्त हुआ। अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु 'इस नाम और इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। वह यह (व्यक्तात्मा) इस (शरीर) में नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट किये हुए है, जिस प्रकार कि क्षुरा क्षुरेके घरमें छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करनेवाला अग्नि अग्निके आश्रय (काष्ठादि) में गुप्त रहता है। परन्तु उसे लोग देख नहीं सकते। वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रियाके कारण ही वह प्राण है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं। अतः इनमेंसे जो एक एककी उपासना करता है, वह नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है। वह एक एक विशेषणसे ही युक्त होता है। अतः 'आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस (आत्मा) में ही वे सब एक हो जाते हैं। यह जो आत्मा है, वही इन सबका प्राप्य है, क्योंकि यह