भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 832 में से

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पृष्ठ 499

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६५ आत्मलोककी ही उपासना करनी चाहिये। जो पुरुष आत्मलोक- की ही उपासना करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता। इस आत्मासे पुरुष जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसी- उसीको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥ यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका भोग्य होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और सन्तानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एव जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका भोग्य होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका भोग्य होता है। जिस प्रकार लोकमें सब अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार यों जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। इस (हवन आदि) कर्मकी अवश्यकर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है ॥ १६ ॥ पहले एक यह आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तानरूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस, इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तान- रूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं करता, तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसकी पूर्णता इस प्रकार होती है—मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण सन्तान है और नेत्र मानुष-वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष-वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैव-वित्तको) सुनता है। आत्मा (शरीर) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है। यह आत्मदर्शनरूप यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह कर्म एव साधनरूप जो कुछ है, सब पाङ्क्त है। जो ऐसा जानता है, वह इन सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ पञ्चम अन्नकी उत्पत्ति और , मन, वाणी और प्राणके रूपमें सृष्टिका विभाग पिता (प्रजापति) ने विज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंकी रचना की, उनमेंसे इसका एक अन्न साधारण है (अर्थात् वह सभी प्राणियोंका भोग्य है), दो अन्न उसने देवताओंको बाँट दिये, तीन अपने लिये रक्खे, एक पशुओंको दिया। उस (पशुओंको दिये हुए अन्न) में, जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सभी प्रतिष्ठित हैं। ये अन्न सर्वदा खाये जानेपर भी क्षीण क्यों नहीं होते? जो इस (अन्नके) अक्षयभावको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है तथा अमृतका भोक्ता होता है। इस विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) हैं—॥ १ ॥ 'यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता' इसका यह अर्थ प्रसिद्ध है कि पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा ही अन्नोंको उत्पन्न किया। उसका एक अन्न साधारण है। अर्थात् यह जो खाया जाता है, वही इसका साधारण अन्न है। जो इसीके परायण रहता है, वह पापसे दूर नहीं होता; क्योंकि यह अन्न मिश्र (समस्त प्राणियोंका सम्मिलित धन) है। दो अन्न उसने देवताओंको बाँटे—वे हुत और प्रहुत हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुष देवताओंके लिये हवन और बलि अर्पण करता है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि ये देवताओंके दो अन्न दर्श और पूर्णमास हैं, इसलिये इन्हें कामनापूर्वक न करे। एक अन्न पशुओंको दिया, वह दुग्ध है। मनुष्य और पशु पहले दुग्धके ही आश्रय जीवन धारण करते हैं, इसलिये उत्पन्न हुए बालक- को पहले घृत चटाते हैं, या स्तनपान कराते हैं, तथा उत्पन्न हुए बछड़ेको भी अतृणाद (तृण भक्षण न करनेवाला) कहते हैं। जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सब इस (पश्वन्न) में ही प्रतिष्ठित हैं। अर्थात् जो प्राणन करते हैं और जो नहीं करते, वे सब हवि दुग्धमे ही प्रतिष्ठित हैं। अतः ऐसा जो कहते हैं कि एक सालतक दुग्धसे हवन करने- वाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह जिस दिन हवन करता है, उसी दिन अपमृत्युको जीत लेता है [एक सालकी अपेक्षा नहीं करता]। इस प्रकार जाननेवाला (उपासना करनेवाला) पुरुष देवताओं- को सम्पूर्ण अन्नाद्य प्रदान करता है, किंतु सर्वदा खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते ? इसका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, वही पुनः-पुनः इस अन्नको उ० अं० ५९—