कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ उत्पन्न कर देता है । जो भी इस अक्षयभावको जानता है अर्थात् पुरुष ही क्षयरहित है, वही इस अन्नको ज्ञान और कर्मद्वारा उत्पन्न कर देता है, यदि वह इसे उत्पन्न न करता तो यह क्षीण हो जाता—[ ऐसा जो जानता है ] वह प्रतीकके द्वारा—मुख ही प्रतीक है, अतः मुखके द्वारा अन्न भक्षण करता है । वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका भोक्ता होता है । यह ( फलश्रुति ) प्रशंसा है ॥ २ ॥ उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन वाणी और प्राणको उसने अपने लिये नियत किया । ‘मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है । काम, सङ्कल्प, सशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति (धारणशक्ति), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं । इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है—वह वाक् ही है, क्योंकि यह वाच्यार्थके कथनमें रत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं, प्रकाशक है । प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा ( शरीर ) वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥ ३ ॥ तीनो लोक ये ही हैं। वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है । तीनों वेद ये ही हैं । वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है । देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता है, मन पितृगण है और प्राण मनुष्य हैं। पिता, माता और सन्तान ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण सन्तान है। विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं । जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है । वाक् ही विज्ञाता है। वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है । जो कुछ जिज्ञासाके योग्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है । मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है। जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है । प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ४-१० ॥ उस वाक्का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है । इनमे जितनी वाक् है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है । तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप यह आदित्य है; इनमें जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है । वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ । वह इन्द्र है और वह असपत्न— शत्रुहीन है, दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी ] ही सपत्न होता है । जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता । तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है । इनमें जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है । ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं । जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है, वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ ११-१३ ॥ इस सवत्सररूप प्रजापतिकी सोलह कलाएँ ( अङ्ग ) हैं। उसकी तिथियाँ ही पन्द्रह कलाएँ हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) है। वह तिथियोंके द्वारा ही [ शुक्लपक्षमें ] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है । अमावास्याकी रात्रिमें वह (चन्द्रमा ) इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [ दूसरे दिन ] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [ इस रात्रिमें ] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥ जो भी यह सोलह कलाओंवाला सवत्सर प्रजापति है, यह वही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवी कला है । वह वित्तसे ही बढता और क्षीण होता है । यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य ( रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा— नेमि) है । इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥ अब मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं । वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं । तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्या (उपासना) से जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है, इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है—] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तब वह पुत्रसे कहता है— 'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता