भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 527

ब्राह्मण ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८९ 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है । याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होने- पर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'वाक् ही इसकी ज्योति होती है । यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर- उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है । इसीसे हे सम्राट् ! जहाँ अपना हाथ भी नहीं जाना जाता, वहाँ ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया जाता है कि पास चला जाता है ।' 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है । याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर और वाक्के भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला रहता है ?' 'आत्मा ही इसकी ज्योति होता है । यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' ॥ २-६॥ [जनक—] 'आत्मा कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योति.- स्वरूप पुरुष है, वह समान (बुद्धिवृत्तियोंके सदृश) हुआ इस लोक और परलोक दोनोंमें सञ्चार करता है। वह [बुद्धिवृत्तिके अनुसार] मानो चिन्तन करता है और [प्राणवृत्तिके अनुरूप होकर] मानो चेष्टा करता है। वही स्वप्न होकर इस लोक (देहेन्द्रिय-सङ्घात) का अतिक्रमण करता है और [शरीर तथा इन्द्रियरूप] मृत्युके रूपोंका भी अतिक्रमण करता है। वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे (देह और इन्द्रियोंसे) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय—उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ७-८ ॥ उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं—यह लोक, परलोक- सम्बन्धी स्थान और तीसरा स्वप्नस्थान सन्ध्यस्थान है। उस सन्ध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान—इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यह पाप (पापका फलरूप दुःख) और आनन्द दोनोंको ही देखता है। जिस समय यह सोता है, उस समय इस सर्ववान् लोककी मात्रा (एकदेश) को लेकर, स्वयं इस स्थूलशरीरको अचेत करके तथा स्वय ही अपने वासनामय देहको रचकर, अपने प्रकाशसे अर्थात् अपने ज्योतिःस्वरूपसे शयन करता है, इस स्वप्न-अवस्थामें यह पुरुष स्वयं ज्योतिःस्वरूप होता है ॥ ९ ॥ उस अवस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] हैं और न मार्ग ही हैं। परंतु यह रथ, रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] और रथके मार्गोंकी रचना कर लेता है । उस अवस्थामें आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु यह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है। वहाँ छोटे-छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; यह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है—वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥ इस विषयमें ये श्लोक हैं—आत्मा स्वप्नके द्वारा शरीरको निश्चेष्ट करके स्वय न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है। वह शुद्ध—इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुनः जागरित-स्थानमे आता है। हिरण्मय (ज्योतिःस्वरूप) पुरुष अकेला ही [दोनों स्थानोंमें] जानेवाला है। इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है। वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष, जहाँ वासना होती है, वहीं चला जाता है। वह देव स्वप्ना- वस्थामें ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ बहुत से रूप बना लेता है। इसी प्रकार वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, [मित्रोंके साथ] हँसता हुआ तथा [व्याघ्रादि] भय देखता हुआ-सा रहता है। सब लोग उसके आराम (क्रीडाकी सामग्री) को ही देखते हैं, उसे कोई नहीं देखता। उस सोये हुए आत्माको सहसा न जगावे—ऐसा [वैद्यलोग] कहते हैं। जिस इन्द्रिय-प्रदेशमें यह सोया होता है, उसमें प्राप्त न होनेसे इसका शरीर दुश्चिकित्स्य हो जाता है। इसीसे अवश्य ही कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि यह (स्वप्नस्थान) इसका जागरित देश ही है; क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्हींको सोया हुआ भी देखता है [किंतु यह ठीक नहीं है], क्योंकि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है।' [जनक—] 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा देता हूँ, अब आगे मुझे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये' ॥ ११—१४ ॥ [ याज्ञवल्क्य—] 'वह यह आत्मा इस सुषुप्तिमें रमण और विहार करके पुण्य और पापको केवल देखकर, जैसे आया था और जहाँसे आया था, पुनः स्वप्नस्थानको ही लौट आता है। वहाँ वह जो कुछ देखता है, उससे असम्बद्ध रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है।' [जनक—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है, मैं श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा देता हूँ; इससे आगे भी मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये' ॥ १५ ॥ [ याज्ञवल्क्य—] 'वह यह आत्मा इस स्वप्नावस्थामें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर ही फिर जिस प्रकार आया था और जहाँसे आया था, उस जागरित- उ० सं० ६२—