भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 832 में से

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पृष्ठ 528

४९० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४

स्थानको ही लौट जाता है। वह वहाँ जो कुछ देखता है, उससे असश्लिष्ट रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है। मैं श्रीमान्- को सहस्र मुद्रा भेंट करता हूँ; इससे आगे आप मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'वह यह पुरुष इस जागरित-अवस्थामें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर फिर जिस प्रकार आया था, उसी मार्गसे यथास्थान स्वप्नस्थानको ही लौट जाता है' ॥ १६-१७ ॥

जिस प्रकार कोई बड़ा भारी मत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः विचरण करता है, उसी प्रकार यह पुरुष स्वप्नस्थान और जागरितस्थान इन दोनों ही स्थानोंमे क्रमशः विचरण करता है। जिस प्रकार इस आकाशमे श्येन (बाज ) अथवा सुपर्ण (तेज उड़नेवाला बाज) सब ओर उड़कर थक जानेपर परोंको फैलाकर घोंसलेकी ओर ही उड़ता है, उसी प्रकार यह पुरुष इस स्थानकी ओर दौड़ता है, जहाँ सोनेपर यह किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है ॥ १८-१९ ॥

उसकी ये वे हिता नामकी नाड़ियाँ, जो सहस्र भागोंमें विभक्त केशके सदृश सूक्ष्मतासे रहती हैं, शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं। सो जहाँ इस पुरुषको मानो [शत्रु] मारते, मानो अपने वशमे करते और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहाँ यह मानो गड्ढेमें गिरता है, इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उसीको इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता-जानता है। और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परम धाम है ॥ २० ॥

वह इसका कामरहित, पापरहित और अभय रूप है। व्यवहारम जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करने- वाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इस- का आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है। इस सुषुप्तावस्थामे पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं। यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण और तापस अतापस हो जाते हैं। उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है ॥ २१-२२ ॥

वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता। द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे। वह जो नहीं सूँघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता; सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे वह सूँघे। वह जो रसास्वाद नहीं करता, सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता। रसास्वाद करने- वालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामे उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे। वह जो नहीं बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता। वक्ताकी वचन- शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषय- में वह बोले। वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता। श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामे उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने। वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन नहीं करता। मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमे वह मनन करे। वह जो स्पर्श नहीं करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता। स्पर्श करनेवालेभी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे। वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता। विज्ञाताकी विज्ञाति (विज्ञानशक्ति) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ २३-३० ॥

जहाँ (जागरित या स्वप्नावस्थामें) आत्मासे भिन्न अन्य- सा होता है, वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, अन्य अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका

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