भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 579

खण्ड ९ ] $\quad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\quad$ ५३७ \rule{\linewidth}{0.5pt} करे। (वसु, रुद्र, आदित्य और वषट्कार—ये सब मिलकर बत्तीस हैं। इनका क्रमशः एक-एक दलमें ध्यान एव न्यास करना चाहिये। ध्रुव, धर, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु बताये गये हैं। विष्णु- पुराण ($१$।$१$।$१५$) के अनुसार हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, शम्भु, वृषाकपि, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, त्वष्टा तथा विष्णु— ये बारह आदित्य हैं)। उक्त बत्तीस दलोंवाले कमलके भी बहिर्भागमे भूपृह (भूपुर* ) बनाये। उसके चारों दिशाओंमें वज्र तथा कोणोंमें शूलका चिह्न अङ्कित करे। उक्त भूपुरको तीन रेखाओंसे भी संयुक्त करे। ये रेखाएँ सत्त्वादि तीन गुणोंको सूचित करनेवाली होंगी। इसके सिवा—जैसे कुण्डी मण्डपमें द्वार बने होते हैं, उसी प्रकार इसमें भी द्वार बनाये। साथ ही, उस भूपुरको राशि आदिसे भी विभूषित करे। अर्थात् उसे ज्योतिर्मण्डलके आकारका बनाकर उसमे यथास्थान राशि आदि स्थापित करे। उक्त भूपुर-यन्त्रको शेषनागसे युक्त बनाये अर्थात् इस पुरमे प्रदर्शित करे कि इस यन्त्रको शेषनागने धारण कर रक्खा है। (अथवा उसको आठों दिशाओंसे आठों नागोंने धारण कर रक्खा है। उनके नाम इस प्रकार हैं— अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख और कुलिक) ॥ १-६ ॥ \begin{center} नवम खण्ड \end{center} \begin{center} पूजा-यन्त्रके शेष भागका वर्णन तथा श्रीरामके माला-मन्त्रका स्वरूप एवं माहात्म्य \end{center} इस प्रकार भूपुर-यन्त्र लिखकर उसकी चारो दिशाओंमें नारसिंह बीज-मन्त्रका और कोणोंमें वाराह बीज मन्त्रका अङ्कन करे। 'क्', 'ष्', 'र्', अनुग्रह (औ), इन्दु (अनुस्वार), नाद (ध्वनि) तथा शक्ति (माया) आदिसे युक्त जो 'क्ष्रौं' मन्त्र है, वही नारसिंह बीज-मन्त्र है। यह ग्रहबाधा-निवारण तथा शत्रुमारण आदि कर्ममें विनियुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि दिलानेमें प्रसिद्ध है। अन्त्य वर्ण (हकार) अर्धांग अर्थात् उकारसे युक्त हो, उसमें बिन्दु (अनुस्वार), नाद (ध्वनि) और शक्ति आदिका भी सयोग हो तो वह 'हुम्' इस प्रकार वाराह-बीज होता है। इस यन्त्रमें उस 'हुम्' को भी (कोणोंमे) अङ्कित करना चाहिये। अब श्रीरामसम्बन्धी माला मन्त्रका वर्णन किया जायगा ॥ १-३ ॥ इसमें पहले तो तार (प्रणव) है, फिर 'नमः' पद है। इसके बाद निद्रा (भ), फिर स्मृति (ग), फिर मेद (व), उसके बाद कामिका (तकार) है, जो रुद्र अर्थात् ए से युक्त है। तदनन्तर अग्नि (र), फिर मेधा (घ), जो अमर (उ) से विभूषित है। उसके बाद दीर्घ कला (न) है, जो अक्रूर अर्थात् सौम्य—चन्द्रमा (अनुस्वार) से संयुक्त है। तत्पश्चात् ह्लादिनी (द) है। फिर दीर्घा कला (न) है, जो मानदा कला (आ) से सुशोभित है। उसके बाद क्षुधा (य) है। यहाँतक 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' की सिद्धि हुई। तदनन्तर क्रोधिनी (र), अमोघा (क्ष्) और विश्व (ओ) है, जो मेधा (घ्) से सयुक्त है। फिर दीर्घा (न) है, उसके बाद ज्वालिनी अर्थात् वह्नि-कला (व) है, जो सूक्ष्म—रुद्र (इकारकी मात्रा) से युक्त है। फिर मृत्यु—प्रणवरूपा (श्) है, जो प्रतिष्ठा अर्थात् उच्चारणके आधारस्वरूप 'अ' से सयुक्त है। फिर ह्लादिनी (दा) और त्वक् (य) है। इससे 'रक्षोघ्नविशदाय' इस मन्त्रभाग- का उद्धार हुआ। तदनन्तर श्वेल (म), प्रीति (घ), अमर (उ), ज्योति (र), तीक्ष्णा (पू), जो अग्नि (र), से सयुक्त है, श्वेता (स), जो अनुस्वारसे युक्त है, फिर कामिका अर्थात् तकारसे पाँचवाँ अक्षर (न), फिर 'ल'के बादका अक्षर (व); 'त'के बादवाले 'थ' के पीछेका अक्षर (द), फिर 'ध' के बादका अक्षर (न) है, जो अनन्त (आ) से सयुक्त है। तत्पश्चात् दीर्घस्वरसे युक्त वायु (या), सूक्ष्म (ह्रस्व) इकारसे युक्त विप—मकार (मि), कामिका (त), फिर कामिकामें रुद्र (ए) का सयोग= (ते) है। तदनन्तर स्थिरा (ज) है, उसके बाद 'स' अक्षर और उसमें 'ए'की मात्रा है (से)। इस प्रकार 'मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजसे' इस मन्त्रभागका उद्धार हुआ। इसके बाद तापिनी (ब), दीर्घ (ल) और उसमें भू यानी दीर्घ 'आ' की मात्रा है। फिर अनिल (य) है। इस प्रकार 'बलाय' की सिद्धि हुई। तत्पश्चात् अनन्तग अनल अर्थात् 'आ' की मात्रासे युक्त रेफ (रा) है, फिर नारायणामक—अर्थात् आकारकी मात्रासहित काल—मकार (मा) है, उसके बाद प्राण (य) है। इससे 'रामाय' की सिद्धि हुई। तदनन्तर विद्यायुक्त अम्बस् अर्थात् \rule{\linewidth}{0.5pt}

  • भूपुर-यन्त्रका लक्षण इस प्रकार दिया गया है—'भूमेरतुरस्रं सवज्रक पीतं च'—चौकोर रेखा, वज्र-चिह्नका संयोग और पीला रंग—यह भूपुर है। उ० अ० ६८—