कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५३८ * श्रीरामपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ खण्ड १०
इकारकी मात्रासे युक्त वकार ( वि ) है । फिर पीता ( ण् ), आचायोंने इसका उपदेश किया है तथा ऋषि महर्षियोंने भी रति ( ण ), और 'ल'के बादका ( व ) है, जो योनि ( ए ) से युक्त इस मन्त्रका सेवन किया है । जो इसका सेवन करते हैं, उन्हें है? इससे 'विष्णवे' की सिद्धि हुई । अन्तमे पुनः नति— यह मोक्ष देता तथा उनकी आयु और आरोग्यकी वृद्धि प्रणामका वाचक 'नम' शब्द और प्रणव है ॥ ४–९ ॥ करता है। इतना ही नहीं, यह पुत्रहीनोको पुत्र भी देता 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोध्नविशदाय मधुर- है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; इस मन्त्रके सेवनसे मनुष्य प्रसन्नवदनायामिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः ॐ ॥' सब कुछ बहुत शीघ्र पा जाते हैं। इसके आश्रयसे उपासक यह सैंतालीस अक्षरोंका मालामन्त्र राज्याभिषिक्त भगवान् धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदिको भी प्राप्त कर श्रीरामसे सम्बन्ध रखता है। सगुण होनेपर भी उपासकों- सकते हैं ॥ ११-१२ ॥ के तीनो गुणोंका नाशक है (अर्थात् त्रिगुणमयी मायाका बन्धन यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य है। इस प्रकार जो यह यन्त्र नष्ट करके उन्हें दिव्य साकेत धामकी प्राप्ति करानेवाला है)। बताया गया है, बिना उपदेशके किसी परम सामर्थ्यशाली पुरुष- इस मन्त्रको पहले बताये हुए क्रमसे ही लिखना चाहिये ॥१०॥ के लिये भी दुर्गम है। प्राकृत जनोंको इसका उपदेश नहीं देना यह उपर्युक्त यन्त्र सर्वात्मक—सर्वस्वरूप है। प्राचीन चाहिये ॥ १३ ॥
दशम खण्ड पूजाकी सविस्तर विधि सर्वप्रथम द्वार पूजा करके पद्मासन आदि आसनसे बैठे, आदि तत्त्वोंको क्रमशः अपने कारणमे लय करते हुए अन्तमें सब फिर प्रसन्नचित्त होकर पञ्चभूत आदिकी शुद्धि करे । (पृथिवी कुछ परमात्मामे लय कर देना ही तत्त्वोंका शोधन है। भूतशुद्धि
१ द्वारपूजाकी विधि इस प्रकार है। आचार्य विधिपूर्वक स्नान करके पूर्वाङ्ग-कृत्य (सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य-नियम) कर लेने- के पश्चात् वस्त्र और माला आदिसे अलङ्कृत हो पूजनादिरूप यज्ञके लिये मौनभावसे यज्ञ-मण्डपमें पदार्पण करे । वहाँ सविधि आचमन करके सामान्यत पूजाके लिये अर्घ्य बनाकर रख ले । फिर मन्त्रयुक्त जलसे द्वारका अभिषेक करके उसका पूजन आरम्भ करे। द्वारके ऊपरी भागमें उदुम्बर (गूलर) का काष्ठ हो, उसमें विघ्न, लक्ष्मी तथा सरस्वतीका ('विं विघ्नाय नम, लं लक्ष्म्यै नम, सं सरस्वत्यै नम'—इन मन्त्रोंसे ) आवाहन-पूजन करे। तत्पश्चात् द्वारकी दक्षिण शाखा में विघ्नका और वाम शाखा में क्षेत्रपालका पूजन करे। इन दोनोंके पार्श्वभागमें क्रमशः गङ्गा- यमुनाका पुष्प और जलसे पूजन करे । (दक्षिण द्वारभागमें गङ्गाका और वाम द्वारभागमें यमुनाका पूजन करना उचित है।) तत्पश्चात् द्वारके निचले भागमें देहलीपर 'अस्त्राय फट्'का उच्चारण करते हुए 'अस्त्र'की पूजा करे। प्रत्येक द्वारपर इसी क्रमसे पूजन करना चाहिये ।
२ पद्मासन लगानेकी विधि यह है। बायीं जाँघपर दाहिना चरण रक्खे और दायीं जाँघपर बायाँ चरण रक्खे । फिर दाहिने हाथ- को पीठकी ओरसे ले जाकर बायें चरणका अँगूठा दृढ़ताके साथ पकड़ ले। इसी प्रकार बायें हाथको पीछेकी ओरसे ले आकर दाहिने चरणका अंगूठा पकड़ ले। फिर गर्दन झुकाकर अपनी ठोढ़ीको छातीमें सटा ले और नेत्रोंसे केवल नासिकाके अग्रभागको ही देखे। यह योगाभ्यासी पुरुषोंके उपयोगमें आनेवाला पद्मासन कहलाता है, यह रोगोंका नाश करनेवाला है। परंतु जो भगवान्की पूजा करने बैठा हो, वह दोनों हाथोंसे अँगूठा पकड़नेका कार्य न करे, क्योंकि वैसे करनेपर हाथ खाली न रहनेसे पूजा सम्भव न होगी।
३ भूतशुद्धिका प्रकार यह है। अपने शरीरमें पैरोंसे लेकर घुटनोंतकका भाग पृथिवीका स्थान है—ऐसी भावना करे। यह पृथिवीका स्थान चौकोर, वज्रके चिह्नसे युक्त और पीतवर्ण है, इसमें 'लं' बीज अङ्कित है। इस प्रकार चिन्तन करे। घुटनोंसे लेकर नाभि- तकके भागको जलका स्थान मानकर यह भावना करे कि इसकी आकृति अर्धचन्द्रके समान और वर्ण शुक्ल है। इसमें कमलका चिह्न है। इस जलमण्डलमें 'वं' बीज अङ्कित है। नाभिसे लेकर कण्ठतकके भागको भावनाद्वारा त्रिकोणाकार अग्निमण्डलके रूपमें देखे । उसका वर्ण लाल है, उसमें स्वास्तिका चिह्न और 'रं' बीज अङ्कित है—इस प्रकार चिन्तन करे। कण्ठसे ऊपर भौंहोंके मध्यतकका भाग वायुमण्डल है। उसका वर्ण कृष्ण है, आकृति षट्कोण है और वह छ विन्दुओंसे चिह्नित है। उसमें 'यं' बीज अङ्कित है। यों ध्यानद्वारा देखे। भौंहोंके मध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतकका भाग आकाशमण्डल है। उसकी आकृति गोल और रंग धूएँके समान है। उसमें ध्वजका चिह्न और 'ह्रं' बीज अङ्कित है। ऐसा ध्यान करे। इस प्रकार चिन्तन करनेके पश्चात् उन भूतोंका लय करे। पृथिवीको जलमें, जलको अग्निमें, अग्निको वायुमें, वायुको आकाशमें तथा आकाशको अव्यक्त प्रकृतिमें विलीन करे। यह प्रकृति ही अपरब्रह्म अथवा माया कहलाती है, इसका परमात्मामें लय करे। इस प्रकार भावनाद्वारा समस्त देहादि प्रपञ्चका परमात्मामें लय करके कुछ क्षणतक परमात्मरूपसे ही स्थित रहे, अर्थात् ध्यानद्वारा यह देखे कि मैं परमात्मामें मिलकर उनसे अभिन्न हो गया हूँ। फिर (ध्यानसे जगनेपर) अपने लिये