भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 581

खण्ड १०] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३९ यहाँ प्राण-प्रतिष्ठा और मातृकान्यासका भी उपलक्षण ऊर्ध्वभाग तथा पार्श्वभाग आदिमें भी देव पूजन करनेकी है।) भगवान् श्रीरामके पूजन क्रममें सिंहासनपीठके अधोभाग, विधि है। पीठके ऊपर मध्यभागमें जो अष्टदल कमल है, भावनाद्वारा ही परम पवित्र शरीरकी सृष्टि करे। मानो परमात्मासे शब्द-ब्रह्मात्मिका माया प्रकट हुई है। यही जगन्माता और परा प्रकृति है। इस जगन्मातासे आकाश उत्पन्न हुआ है। आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथिवी प्रकट हुई है। इन विशुद्ध भूतोंसे अपना यह तेजोमय शरीर निर्मित हुआ है, जो परम पवित्र होनेके कारण आराध्यदेवकी आराधनाके सर्वथा योग्य है। उस शरीरमें सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, समस्त देवतारूप, सम्पूर्ण मन्त्रमय एव कल्याणमय परमात्मा ही आत्मा एव कारणरूपसे विराजमान हैं। इस प्रकारकी भावना ही मुख्यत भूतशुद्धि कही गयी है। भूतशुद्धिकी दूसरी प्रक्रिया इस प्रकार है। साधक यह भावना करे कि मेरा हृदय एक प्रफुल्ल कमल है, जो प्रणवके द्वारा विकासको प्राप्त हुआ है। धर्म ही इस हृदय-कमलका मूल और ज्ञान ही नाल (मृणाल) है। यह बहुत ही शोभायमान है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य ही इसके आठ दल हैं। वैराग्य ही इसकी कर्णिका (मध्यभाग) है। इस कर्णिकामें जीवात्मा विराजमान है, जिसकी आकृति दीपककी ज्योतिके समान है। ऐसी भावनाके साथ साधक उस जीवात्माको सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे ब्रह्मरन्ध्रतक ले जाय और उसे परमात्मामें मिला दे। उस समय वह अपनेको परमात्मासे अभिन्न देखता हुआ 'सोऽहम्' मन्त्रका चिन्तन करता रहे। फिर योगयुक्त विधिसे अन्य सब (पृथिवी आदि) तत्त्वोंको भी वहीं परमात्मामें विलीन कर दे। तत्पश्चात् अनादि जन्मोंमें सञ्चित किये हुए पाप-समुदायका एक पुरुषके रूपमें चिन्तन करे। ब्रह्महत्या उस पापरूपपुरुषका मस्तक है, सुवर्णकी चोरी उसकी दो भुजायें हैं, सुरापानरूपी हृदयसे वह युक्त है। गुरुपत्नी-गमन ही उसके दो कटिभाग हैं। इन पापों और पापियोंका संसर्ग ही उसके युगल चरण हैं। उसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग पातकमय ही है। उपपातक ही उसके रोयें हैं। उसकी मूँछ-दाढ़ीके बाल और नेत्र लाल हैं। उसके शरीरका रंग काला है और वह अपने हाथोंमें ढाल-तलवार लिये हुए है। ऐसे पापमय पुरुषको अपनी कुक्षिक भीतर दाहिने भागमें स्थित देखते हुए चिन्तन करे । तत्पश्चात् पूरक आदिके क्रमसे अर्थात् पूरक, कुम्भक और रेचकरूप प्राणायामके द्वारा प्राणवायुको रोककर 'यं' बीज एव वायुके द्वारा उस पापरूपके शरीरको सुखा दे। फिर अग्नि-बीज 'रं'के द्वारा अग्नि प्रकट करके उससे उसके शुष्क शरीरको जला डाले । तत्पश्चात् उत्तम शुद्धिसे युक्त विद्वान् पुरुष यह चिन्तन करे कि उस पापरूपके दग्ध शरीरका भस्म मेरी नासिकाके मार्गसे बाहर निकल आया है। तदनन्तर 'वं' इस बीजके द्वारा जल प्रकट करके उससे अपने समस्त शरीरको आप्लावित कर दे। इस प्रकार उस भावनामय दिव्य जलमें स्नान करके जब समस्त शरीर निर्मल एव देवोपासनाके योग्य हो जाय, तब अपने साथ परमात्मामें लीन हुए पृथिवी आदि तत्त्वोंको पुन अपनी-अपनी पूर्वावस्थामें पहुँचा दे। फिर जीवात्माको भी परमात्मासे पृथक् करके 'हंस.' इस मन्त्रका जप करते हुए विधिवूर्वक हृदय-कमलपर ले आये। इस प्रकार भूतशुद्धि कर लेना आवश्यक है। भूतशुद्धिके विना की हुई पूजा अभिचार तथा बिना भक्तिके पूजनकी भाँति विपरीत फल दे सकती है। १. इस प्रकार भूतशुद्धि करनेके पश्चात् प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये । इसका विनियोग इस प्रकार है- 'अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठा- मन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषय ऋग्यजु सामाथर्वाणि छन्दांसि क्रियामयवपु प्राणाख्या देवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम्, अस्यां मूर्तौ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोग ।' इस प्रकार विनियोग करके भगवान्की प्रतिमा अथवा यन्त्रपर हाथ रखकर निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े- 'ॐ आं ह्रीं क्रों अं यं रं वं शं षं सं हं ळं क्षं अं क्रों ह्रीं आं इस सोऽहम्, अस्यां मूर्तौ अमुष्य प्राणा इह प्राणा ।' इसका उच्चारण करते समय भावना करनी चाहिये कि इस भगवद्विग्रहमैं प्राण-सञ्चार हो रहा है। 'अस्या मूर्ती' के आगे 'अमुष्य' के स्थानमें 'श्रीरामस्य' इत्यादि आवश्यकताके अनुसार जोड़ लेना चाहिये। इसी प्रकार पूर्वोक्त बीजोंको 'ॐ आं से लेकर सोऽहम्' तक पुन पढ़कर 'अस्यां मूर्ती अमुष्य जीव इह स्थित' इस वाक्यका उच्चारण करते हुए यह भावना करनी चाहिये कि इस भगवद्विग्रहमें जीवात्मारूपसे भगवान् स्वय विराजमान हो रहे हैं। इसी प्रकार पुन 'ॐ आ ह्रीं' इत्यादि पढ़कर 'अस्या मूर्तौ अमुष्य सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मनस्त्वक्चक्षु श्रोत्रजिह्वाघ्राणपाणिपादपायूपस्थानि इहागत्य सुख चिरं तिष्ठन्तु' इसका उच्चारण-करते हुए विग्रह अथवा यन्त्रमें भगवान्की सम्पूर्ण इन्द्रियोंके आविर्भावकी भावना करे। 'अमुष्य' के स्थानपर सर्वत्र 'आराध्यदेव' के नामका षष्ठ्यन्त रूप लेना चाहिये और प्रत्येक कार्यमें तीन-तीन बार पाठ. करना चाहिये । तत्पश्चात् गर्भाधानादि सस्कारकी सिद्धिके लिये षडङ्ग वार प्रणव-जप करना आवश्यक है। प्राणप्रतिष्ठाके समय भगवद्विग्रहमें ऋषि आदिका न्यास भी करना चाहिये। उसका प्रकार यों है- 'ॐ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराषिभ्यो नम' शिरसि । 'ऋग्यजु सामाथर्वच्छन्दोभ्यो नम' मुखे । प्राणदेवतायै नम' हृदि । 'आं बीजाय नम' गुह्ये । 'ह्रीं शक्तये नम' पादयो । 'क्रों कीलकाय नम' नाभौ । इन छह मन्त्रोंका क्रमश उच्चारण करते हुए सिर, मुख, हृदय, गुह्य (गुदा), दोनों पैर और नाभिका दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंसे स्पर्श करना चाहिये । किसी- किसीके मतसे प्राणप्रतिष्ठा-मन्त्रमें केवल ब्रह्मा ही ऋषि, विराट् छन्द और प्रणव बीज है। २. मातृकान्यासका क्रम इस प्रकार है। निम्नाङ्कित वाक्यका उच्चारण करके विनियोग करे- 'ॐ अस्य मातृकान्यासमन्त्रस्य ब्रह्मा