कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० * श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ १० उसका भी पूजन करे । रत्नमय सिंहासनपर सुल्यम, चिकनी तथा सिंहासनके आकारकी तूलिका ( रूईदार गद्दी) की भावना करके उसपर भगवत्स्वरूप आचार्यका पूजन करके पीठके अधोभागमें आराध्य देवताके आसनके नीचे आधारशक्ति, कूर्म (कच्छप), नाग (शेषनाग) तथा पृथ्वीमय दो कमलोंकी भावना करके उन सबकी पूजा करे* ॥ १-२ ॥ विघ्न, दुर्गा, क्षेत्रपाल तथा वाणीका इनके नामके आदिमें बीज लगाकर नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए पूजन करना चाहिये । (नामके आदि अक्षरोंको ही प्रणव और बिन्दुसे सम्पुटित कर देनेपर वह देवताका बीज- मन्त्र बन जाता है। ऐसा ही बीज लगाकर मण्डपके द्वारदेशमें विघ्न आदिकी पूजा करनी चाहिये । पूजाका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ विं विघ्नाय नमः, ॐ हुं दुर्गायै नमः, ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नम, ॐ वां वाण्यै नमः'। फिर पीठके पायोंने, जो अग्निकोण आदिमें स्थित हैं, क्रमशः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका पूजन करे ।† और पीठके अवयवगत पूर्वादि दिशाओं- में क्रमशः अधर्म, अनर्थ, अकाम और अमोक्षकी पूजा करे। फिर पीठके ऊपर मध्यभागमें उत्तम पुष्पोंद्वारा पूजित सूर्य, चन्द्र एव अग्निका क्रमशः पूजन करे । यन्त्रमें जो बीज (कर्णिका) सहित तीन वृत्तं (गोलाकार चिह्न) हैं, उन्हें क्रमशः सत्त्व, रज और तमका प्रतीक मानकर चिन्तन और पूजन करना चाहिये‡ ॥ ३-४ ॥ ऋषि गायत्री छन्द सरस्वती देवता भगवत्प्रीतये ललाटाद्यङ्गेषु मातृकावर्णानां न्यासे विनियोगः ।' तत्पश्चात् निम्नाङ्कित छ वाक्योंको पढ़कर न्यास करे—१- 'अ क ख ग घ ङ आं' हृदयाय नमः । २- 'इ च छ ज झ ञ ईं' शिरसे स्वाहा। ३- 'उ ट ठ ड ढ ण ऊं' शिखायै वषट् । ४- 'ए त थ द ध न ऐं' कवचाय हुम् । ५- 'ओ प फ ब भ म औं' नेत्रत्रयाय वौषट् । ६- 'अं य र ल व श ष सं हं ळ क्ष अः' अस्त्राय फट् । इनमेंसे पहले तीन वाक्योंको पढ़कर दाहिने हाथकी अँगुलीयोंसे क्रमश हृदय, सिर और शिखाका स्पर्श करना चाहिये । चौथे वाक्यको पढ़कर दाहिने हाथसे बायें और बायें हाथसे दायें कंधेका एक साथ ही स्पर्श करना चाहिये । पाँचवें वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाट के मध्यभागका स्पर्श करना चाहिये तथा छठे वाक्यको पढ़कर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये । तदनन्तर ध्यान करे—'मै उज्ज्वल कान्ति एव तीन नेत्रोंसे विभूषित माता सरस्वती देवीकी शरण लेता हूँ । उनके मुख, भुजा, चरण, कटिभाग एव वक्ष स्थल आदि अङ्ग पचास अक्षरोंमें विभक्त हैं । मस्तकपर अर्धचन्द्रजटित चमचमाता हुआ किरीट शोभा पा रहा है। उनके उरोज सब ओरसे उभरे हुए—स्थूल एव ऊँचे हैं। वे अपने कर-कमलोंमें मुद्रा, अक्षसूत्र, अमृतपूर्ण कलश और विद्या धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार ध्यान करके ललाट, मुख-मण्डल, दोनों नेत्र, दोनों कान, दोनों नासिका, दोनों कपोल, दोनों ओष्ठ, दोनों दन्तपङ्क्ति, मस्तक, मुख, दोनों बाहुमूल, दोनों कूर्पर (कोहनी), दोनों मणिबन्ध (कलाई), दोनों हाथोंके अङ्गुलिमूल, दोनों हाथोंके अङ्गुल्यग्र, दोनों ऊरुमूल, दोनों जानु (घुटने), दोनों गुल्फ (टखने), दोनों पैरोंके अङ्गुलिमूल, दोनों पैरोंके अङ्गुल्यग्र, दोनों पार्श्वभाग, पीठ, नाभि, उदर, हृदय, दायें कधे, ककुद् (गलेके पीछेका भाग), बायें कधे, हृदयादि दक्षिणहस्त, हृदयादि वामहस्त, हृदयादि दक्षिणपाद, हृदयादि वामपाद, हृदयादि उदर तथा हृदयादि मुख—इन अङ्गोंमें 'अ नम, आं नम' इत्यादिरूपसे ५१ मातृका- वर्णोंका न्यास करे ।
- आधारशक्तिका ध्यान एक देवीके रूपमें करना चाहिये । वह अपने दोनों हाथोंमें दो कमल धारण किये हुए है । उस आधारशक्ति के मस्तकपर भगवान् कूर्म विराजमान है, उनकी कान्ति नीले रंगकी है । उनके ऊपर भगवान् अनन्त (शेषनाग) की स्थिति है, जो रत्नमयी शिलापर आसीन हैं । उनके श्रीअङ्ग कुन्दसदृश गौर हैं । उनके हाथमें चक्र है तथा उन्होंने मस्तकपर वसुन्धरा देवीको धारण कर रक्खा है । देवी वसुन्धराकी अङ्गकान्ति तमालके समान श्यामल है । वे नील कमल धारण करती हैं । उनके कटिप्रदेशमें लहराता हुआ समुद्र ही मेखला (करधनी) की शोभा दे रहा है। उक्त वसुन्धरापर एक रत्नमय द्वीप है, जहाँ मणिमय मण्डप शोभा पा रहा है । इस क्रमसे मण्डपतककी पूजा करके उसके प्रवेश-द्वारपर विघ्न आदिकी पूजा करनी चाहिये । † धर्म आदिका ध्यान और पूजन-क्रम इस प्रकार है । साधकको उसकी इच्छाके अनुरूप सिद्धि प्रदान करनेवाले चार कल्पवृक्ष हैं, ऐमी भावना करके उनकी पूजा करे । फिर उनके नीचे मण्डलाकार एव तेजसे जाज्वल्यमान वेदीकी भावना करके उसकी पूजा करे । उस वेदीपर रत्नमय पीठका धर्म आदिके साथ पूजन करे । धर्मका रग लाल है, वह वृषभरूपसे स्थित है । अर्थका रंग साँवला है, वह सिंहकी आकृति धारण किये हुए है । काम का रंग हल्दीके समान पीला है, वह भूतकी आकृतिमें है तथा मोक्षका रग नीला है, उसका आकार हाथी के समान है । पीठके पायोंने अग्निकोण आदिमें धर्म आदिका तथा पीठके अन्य अवयवोंमें पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः अधर्म आदिका पूजन करे । तत्पश्चात् कमलका पूजन आरम्भ करे । ‡ ॐ स सत्त्वाय नम, ॐ र रजसे नम., ॐ त तमसे नम-- इन मन्त्रोंसे सत्त्वादि रूप तीनों वृत्तोंका पूजन करे ।