कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद् २ ] ·· महन्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति · ५५३ भिन्न भिन्न नाममे पाँच नामवाले प्रतीत होते हैं—वास्तवमे 'कृष्ण' आदि पाँच नामोंद्वारा एक ही भगवान्का प्रतिपादन होता है ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात उन मुनियोंने कहा—'सम्पूर्ण जगत्के आश्रयभूत परमात्मा गोविन्दकी उपासना कैसे होती है ? इसका उपदेश दीजिये ॥ ६ ॥ तब ब्रह्माजीने उन प्रसिद्ध मुनियोंमे भगवान्का जो पीठ है, उसका वर्णन करते हुए कहा—पीठपर सुवर्णमय अष्टदल कमल बनाये । उसके मध्यभाग ( कर्णिका ) मे दो त्रिकोण लिखे, जो एक दूसरेसे सम्पुटित हों । इस प्रकार छ कोण होंगे। इन कोणोंके मध्यभागमें स्थित जो कर्णिका है, उसमें आदि अक्षररूप कामबीजका, जो सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिका अमोघ साधन है, उल्लेख करे । फिर प्रत्येक कोणमें 'क्लीं' बीजसहित 'कृष्णाय नमः' मन्त्रके एक एक अक्षरका अङ्कन करे। तत्पश्चात् ब्रह्म-मन्त्र अर्थात् अष्टादशाक्षर गोपाल विद्या एव काम-गायत्रीका यथावत उल्लेख करके आठ वज्रोंसे घिरे हुए भूमण्डलका उल्लेख करे। तत्पश्चात् उक्त मन्त्रोके अङ्ग, वासुदेवादि, रुक्मिणी आदि स्वशक्ति एवं इन्द्र आदि, वसुदेव आदि, पार्थ आदि तथा निधि आदि आठ आवरणोंसे आवेष्टित करके उसकी पूजा करे ।* धारणेके लिये यन्त्र
- यन्त्रकी स्पष्ट विधि इस प्रकार समझना चाहिए । अपने घरपर गोबर और जलसे भूमिको लीप दे । फिर उस शुद्ध भूमिमें धोया हुआ पाठा स्थापित करके उसके ऊपर सुवर्णमय अष्टदल कमलकी स्थापना करे अथवा घिसे हुए चन्दनमें रोली या केसर मिलाकर उससे अष्टदल कमलका रेखाचित्र बना दे । तदनन्तर उस अष्टदल कमलके मध्यभाग (बीचकी कर्णिका) में परस्पर सम्पुटित दो त्रिकोण रचाये । इस प्रकार छ कोण बन जायँगे । इन कोणोंके मध्यभागमें आदि अक्षररूप कामबीज ( क्लीं ) का, जो सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिका थान है, उल्लेख करे । साथ ही साध्य व्यक्तिका तथा उसके कार्यका भी उल्लेख करे ( यथा—'अमुकस्य अमुकं कार्यं सिद्धयतु' ) । ऐसा उल्लेख तभी आवश्यक है, जब धारण करनेके लिये यन्त्र बनाया गया हो । पूजाके लिये निर्मित यन्त्रमें साध्य और कार्यका नाम आवश्यक नहीं है । इसके बाद जो छहों कोण हैं, उनमें 'क्लीं कृष्णाय नमः' इस मन्त्रके एक-एक अक्षरका उल्लेख करे । तत्पश्चात् कोणोंके मध्यभाग अर्थात् कर्णिकामें लिखे हुए पूर्वाक्त मूर्द्धा बीजके चारों ओर अष्टादशाक्षर मन्त्रको इस प्रकार लिखे, जिससे वह उसके द्वारा आवेष्टित हो जाय । तदनन्तर छहों कोणोंमेंसे जो पूर्व, नैर्ऋत्य और वायव्यवाले कोण हैं, उनमें श्रीबीज ( श्रीं ) का उल्लेख करे तथा पश्चिम, अग्निकोण और ईशानवाले कोणोंमें माया-बीज ( ह्रीं ) को अङ्कित करे । फिर अष्टदलोंके केशरोंमें तीन-तीन अक्षरके क्रमसे चौबीस अक्षरोंकी काम-गायत्रीका उल्लेख करे । कामगायत्री इस प्रकार है—'कामदेवाय विद्महे, पुष्पबाणाय धीमहि, तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ।' इसके बाद प्रत्येक दलमें छ-छ अक्षरके क्रमसे अड़तालीस अक्षरवाले काम-मालामन्यका लेखन करे । वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ कामदेवाय मन्मथप्रियाय सर्वजनमोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल सर्वजनस्य हृदयं मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ।' इसके बाद अष्टदलोंके बाहर गोल रेखा खींचकर उसके ऊपर अकारादि क्षयान्त अक्षरोंका पूरा वर्णमालाको इस प्रकार लिखे, जिससे सम्पूर्ण अष्टदल-कमल घिर जाय । फिर इस समन करके बाह्यभाग चौकोर भूमण्डल बनाये । उनके पूर्वादि दिशाओंमें तो श्रीबीज ( श्रीं ) का उल्लेख करे और कोणोंमें मायाबीज ( ह्रीं ) लिखे । तत्पश्चात् इस भूमण्डलकी आठ दिशाओंमें आठ वज्र अङ्कित करे । वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा और शूल—यह वज्रादि-अष्टक ही आठ वज्र कहे गये हैं । इस प्रकार जो यन्त्र बनेगा, वह धारण करनेयोग्य होगा । इसमें पूर्वकथित साध्य और कार्यका उल्लेख आवश्यक है । इसके धारणकी विधि यों है—यन्त्रधारणके समय पहले देव-पूजन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक एक सहस्र घीकी आहुतियाँ अग्निमें डाले । प्रत्येक आहुतिका हुतशेष घृत यन्त्रपर ही डाले । आहुतियाँ समाप्त होनेपर यन्त्रका मार्जन करे । फिर दस सहस्र बार अष्टादशाक्षर मन्त्रका जप करके इस उत्तम यन्त्रको धारण करना चाहिये । इसे विधिपूर्वक धारण करनेवाले पुरुषको त्रिभुवन- का ऐश्वर्य मिल सकता है तथा वह देवताओंके लिये भी आदरणीय हो जाता है । पूजनके लिये यन्त्र जब पूजाके लिये यन्त्र-निर्माण किया जाय, तब भी यन्त्रका स्वरूप तो वैसा ही रहेगा, केवल साध्य और कार्यका नाम नहीं रहेगा । इसके सिवा यन्त्र-पूजाके पहले पीठकी विभिन्न दिशाओंमें कुछ देवताओंका पूजन कर लेना आवश्यक होगा तथा पीठस्थ यन्त्रके चारों ओर आवरण-देवताओंकी भी स्थापना और पूजा आवश्यक होगी। यहाँ पहले पीठके सब ओर पूजित होनेवाले देवताओंका क्रम बताया जाता है— पहले पीठके उत्तर भागम वायव्यकोणसे लेकर ईशानकोणतक चतुर्विध गुरुओंका पूजन करे, यथा—'ॐ गुरुभ्यो नम, परमगुरुभ्यो नम, परात्परगुरुभ्यो नम, परमेष्ठिगुरुभ्यो नम ।' फिर पीठके दक्षिण भागमें गणेशका आवाहन-पूजन करे । तत्पश्चात् यन्त्रगत अष्टदल