कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५५४ * गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────── उक्त आवरणोंसे परिवेष्टित श्रीकृष्णचन्द्रका तीनों इस विषयमें ये श्लोक हैं— संध्याओंके समय ध्यान करके षोडश आदि उपचारोंद्वारा एको वशी सर्वग कृष्ण ईड्य सदा उनका पूजन करना चाहिये । इस प्रकार पूजा करनेसे एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति । उपासकको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ प्राप्त हो तं पीठस्थं येऽनुयजन्ति धीरा- जाता है, सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥ ७ ॥ स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ८ ॥ ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────── कमलकी कर्णिकाके निम्नभागमें—आधारशक्ति, प्रकृति, कमठ, शेष, पृथ्वी, क्षीरसागर, श्वेतद्वीप, रत्नमण्डप तथा कल्पवृक्ष-इन नौकी पूजा करे। यह-पूजा भावनाद्वारा कर्णिकामें ही कर ली जायगी। फिर पीठ (चौकी) के पायोंमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। क्रम इस प्रकार होगा—अग्निकोणमें धर्म, नैर्ऋत्यकोणमें ज्ञान, वायव्यकोणमें वैराग्य तथा ईशानकोणमें ऐश्वर्यकी पूजा होगी । इसी प्रकार पीठके पूर्वादि अवयवोंमें भी क्रमश धर्म आदिकी पूजा होगी । इसके बाद कर्णिकामें ही क्रमश 'अनन्ताय नम', 'पद्माय नम', 'अ द्वादशकलाव्याप्तसूर्यमण्डलात्मने नम', 'ॐ षोडशकलाव्याप्तचन्द्रमण्डलात्मने नम', 'म दशकलाव्याप्तवह्निमण्डलात्मने नम', 'स सत्त्वाय नम', 'र रजसे नम', 'त तमसे नम', 'आ आत्मने नम', 'अ अन्तरात्मने नम', 'प परमात्मने नम', 'ज्ञाँ ज्ञानात्मने नम'—इन मन्त्रोंद्वारा पूजा करे । फिर अष्टदल कमलके प्रत्येक दलमें क्रमश 'विमलायै नम', 'उत्कर्षिण्यै नम', 'ज्ञानायै नम', 'क्रियायै नम', 'योगायै नम', 'प्रह्वयै नम', 'सत्यायै नम', 'ईशानायै नम'—इन मन्त्रोंसे विमला आदि आठ शक्तियोंकी पूजा करके पुन कर्णिकामें 'अनुग्रहायै नम' इस मन्त्रसे नवीं शक्तिकी पूजा करे । तत्पश्चात् 'ॐ नमो विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगार्थ पद्मपीठात्मने नम' इस पीठमन्त्रका अष्टदल कमलके ऊपर विन्यास करके पीठकी पूजा करे । फिर पीठपर भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन और ध्यान करके षोडशोपचारसे पूजन करना चाहिये । भगवान्का ध्यान इस प्रकार करे— सस्मेरं वृन्दावने रम्ये मोदयन्तं मनोरमम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं गोपकन्या सहस्रशः ॥ आत्मनो वदनाम्भोजप्रेरिताक्षिमधुव्रता । पीडिता कामगानेन निरूपाश्लेषलोत्सुका ॥ मुक्ताहारलसत्पीनतुङ्गस्तनभरान्विता । सन्ताधम्मिल्लयसना मद्रसल्लितभूषणा. ॥ दन्तपङ्क्तिप्रभोद्भासिस्पन्दमानाथराञ्चिता । विलोभयन्त्यो विविधैर्विभ्रमैर्भावगर्भितै ॥ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलाञ्चिततनुं गो-गोपसङ्घावृतं गोविन्दं कलवेणुनादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ॥ तत्पश्चात् आवरण-पूजा करनी चाहिये । यह आवरण पूजा अष्टदल कमलम् ही करनी चाहिये । इसका प्रथम आवरण इस प्रकार है । छ कोणोंमेंसे आग्नेयकोणमें 'हृदयाय नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'शिरसे स्वाहा', वायव्यकोणमें 'शिखायै वषट्', ईशानकोणमें 'कवचाय हुम्', अग्रभागमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा पूर्व आदि चारों दिशाओंमें 'अस्त्राय फट्' इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजन करे । द्वितीय आवरण—पूर्वदिशामें 'वासुदेवाय नम', दक्षिणमें 'सकर्षणाय नम', पश्चिममें 'प्रद्युम्नाय नम', उत्तरमें 'अनिरुद्धाय नम'—इन मन्त्रोंसे पूजा करके अग्निकोणमें 'शस्त्यै नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'श्रियै नम', वायव्यकोणमें 'सरस्वत्यै नम' तथा ईशान- कोणमें 'रत्यै नम'—इन मन्त्रोंद्वारा शक्ति आदिका पूजन करे । तृतीय आवरण—फिर कमलके आठ दलोंमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे रुक्मिणी आदि आठ पटरानियोंकी स्थापना और पूजा करे— यथा रुक्मिण्यै नम, सत्यभामायै नम, जाम्बवत्यै नम, नाग्नजित्यै नम, मित्रविन्दायै नम, कालिन्द्यै नम, लक्ष्मणाथै नम, सुशीलायै नम । चतुर्थ आवरण—यहाँ पूर्वमें पीतवर्ण वसुदेव, अग्निकोणमें श्यामवर्णा देवकी, दक्षिणमें कर्पूरगौरवर्ण नन्द, नैर्ऋत्यमें कुङ्कुम-सदृश गौरवणां यशोदा, पश्चिममें शङ्ख, कुन्द एव चन्द्रके समान उज्ज्वल वर्णवाले बलदेव, वायव्यकोणमें मयूरपिच्छतुल्य श्यामवर्णा सुभद्रा, उत्तरमें गोपगण तथा ईशानकोणमें गोपाङ्गनाओंकी क्रमश पूजा करनी चाहिये । इनके नामको चतुर्थ्यन्त करके 'नम' लगा देनेसे पूजाका मन्त्र हो जाता है । पञ्चम आवरण—कमलके मध्यभागमें क्रमश अर्जुन, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन, सात्यकि, गरुड़, नारद तथा पर्वतकी पूजा नाम-मन्त्रोंसे ही करे ।